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“क़ुर्बानी की हक़ीक़त, इसका मक़सद और कोरोना काल में क़ुर्बानी”

नई दिल्ली (मोहम्मद ख़ुर्शीद अकरम सोज़)। क़ुर्बानी की हक़ीक़त और इसके मक़सद पर गुफ़्तगू करने से क़ब्ल इस्लाम के बुनियादी अक़ीदा “तौहीद” पर एक नज़र डालना ज़रूरी है क्यूँकि क़ुर्बानी दर-हक़ीक़त अल्लाह की अताअत-ओ- मुहब्बत और अल्लाह की तौहीद पर क़ायम रहने के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान कर देने का इज़हार है.

दरअसल,  दुनिया के तमाम मज़ाहिब में किसी न किसी शक्ल में एक सर्वशक्तिमान ख़ुदा के वजूद की मान्यता मौजूद है . इस्लाम में इस एक ख़ुदा के वजूद की मान्यता को “तौहीद” कहते हैं . इस्लामी तौहीद इस बात का इक़रार है कि अल्लाह ( एक ईश्वर ) के सिवा कोई भी इबादत के क़ाबिल नहीं ! इसी इक़रार को तौहीद का कलमा भी कहते हैं अर्थात “ लाइलाहा इल्लल लाह (لَا إِلٰهَ إِلَّا الله )”. पहले पैग़ंबर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से लेकर आख़री पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ तक तमाम पैग़ंबर इसी तौहीद पर क़ायम रहने की दावत लेकर अपनी-अपनी क़ौम के पास अल्लाह की तरफ़ से भेजे गए . इस्लामी तौहीद के मुताबिक़ ईश्वर एक है , वह सर्वशक्तिमान है ,वह सारी सृष्टि का सृष्टा / विधाता / ख़ालिक़ है, उसका कोई शरीक / साझी नहीं , ज़िंदगी और मौत उसी के क़ब्ज़े में है, न वह किसी का बाप है न उसका कोई बाप है

आइये इस संबंध में क़ुरान की चंद आयतों पर नज़र डालें:

”अल्लाह, जिसके सिवा कोई माबूद / पूज्य-प्रभु नहीं, वह जीवन्त-सत्ता है, सबको सँभालने और क़ायम रखनेवाला है. उसे न ऊँघ लगती है और न नींद. उसी का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है. कौन है जो उसके यहाँ उसकी अनुमति के बिना सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है. और वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ पर हावी नहीं हो सकते, सिवाय उसके जो उसने चाहा. उसकी कुर्सी (प्रभुता) आसमानों और ज़मीन को व्याप्त है और उनकी सुरक्षा उसके लिए तनिक भी भारी नहीं और वह उच्च, महान है .” (सूरह अल-बक़रा – आयात – 255) “

कहो, “वो अल्लाह यकता (एक अकेला) है, अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, वो न किसी का बाप है न किसी का बेटा, और न कोई उस के बराबर(समकक्ष) है ” (सूरह इख़्लास) तथा अल्लाह ही का है, जो कुछ आकाशों तथा धरती में है और अल्लाह प्रत्येक चीज़ को अपने नियंत्रण में लिए हुए है. (सूरह अन-निसा आयत – 126)

अल-ग़रज़ तौहीद का अक़ीदा इस्लाम की आत्मा है और तमाम इस्लामी इबादात का मर्कज़ तौहीद ही है . क़ुरान की सूरह अल-अनाम में अल्लाह पाक ने पैग़ंबर ﷺ के ज़रिया यह हुक्म दिया, “आप कह दें कि यक़ीनन (निश्चय ही ) मेरी नमाज़, मेरी क़ुर्बानी तथा मेरा जीवन-मरण संसार के पालनहार अल्लाह के लिए है. ( सूरह अल-अनाम आयत-161) ” ; और क़ुर्बानी के वक़्त यही कलमात अदा किए जाते हैं .
क़ुर्बानी के बारे में जब सहाबा ने रसूल ﷺ से पूछा कि क़ुर्बानी क्या है तो रसूल ने जवाब दिया कि यह तुम्हारे बाप (पूर्वज) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का तरीक़ा है.

ईद-अल-अज़हा के मौक़े पर जो क़ुर्बानी पेश की जाती है वह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानियों की यादगार है. यह क़ुर्बानी दर-अस्ल अल्लाह की अताअत-ओ-मुहब्बत और अल्लाह की तौहीद पर क़ायम रहने का इज़हार है. हमारी सारी ज़िंदगी अल्लाह की रज़ा और मंशा के मुताबिक़ गुज़रे और अल्लाह की मुहब्बत में हम अपना माल, अपनी औलाद, अपनी ज़िंदगी अल-ग़रज़ अपना सब कुछ उस की राह में क़ुर्बान करने को तैयार हो जायें जैसा कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम हुब्बे-इलाही ( ईश-प्रेम) में अपना सब कुछ क़ुर्बान करते चले गए यहाँ तक कि अपने नूर-ए-नज़र हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की भी क़ुर्बानी देने को तैयार हो गए जैसा कि क़ुरान में इसका ज़िक्र है:

“फिर जब वह (इस्माईल) पहुँचा उसके साथ चलने-फिरने की उम्र को, तो इब्राहीम ने कहा कि मैं देख रहा हूँ ख़्वाब में कि मैं तुझे ज़ब्ह कर रहा हूँ. अब, तू बता कि तेरा क्या ख़्याल है? उसने कहाः हे पिता! पालन करें, जिसका आदेश आपको दिया जा रहा है. अगर अल्लाह ने चाहा तो आप पायेंगे मुझे साबिरों (सहनशीलों) में से. जब दोनों ने हुक्म मान लिया और बाप ने बेटे को माथे के बल लिटा दिया , तब हमने उसे आवाज़ दी कि हे इब्राहीम! तूने ख़्वाब को सच कर दिखाया , इसी प्रकार, हम बदला देते हैं सदाचारियों को. वास्तव में, ये खुली आज़माइश (परीक्षा) थी. और हमने एक बड़ी क़ुर्बानी को उनका फ़िदया दिया. तथा हमने बाक़ी रखा पीछे आने वालों में इब्राहीम का ज़िक्र-ए-ख़ैर. सलाम हो इब्राहीम पर. इसी तरह हम बदला देते हैं सदाचारियों को. निश्चय ही वह (इब्राहीम) हमारे मोमिन बंदों में से था.
( सूरह अस-सफ़्फ़ात आयात 102-110)”

जैसा कि इन क़ुरानी आयात से स्पष्ट है कि यह (पुत्र की क़ुर्बानी का ख्व़ाब) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की आज़माइश थी, अल्लाह पाक को किसी इंसान की क़ुर्बानी मतलूब नहीं थी . इसलिए अल्लाह पाक ने हज़रत इस्माईल की जगह जन्नत से हज़रत जिब्राईल के ज़रिया एक मेंढा फ़िदया के तौर पर भेज दिया जिसे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने पुत्र की जगह क़ुर्बान किया और क़यामत तक के लिए अल्लाह की रज़ा के लिए दी गई यह क़ुर्बानी एक यादगार बन गई . गोया कि ईद-अल-अज़हा के मौक़े पर जानवरों की क़ुर्बानी पेश करना इस बात का अहद ( प्रतिज्ञा) होता है कि हमारी ज़िंदगी का हर अमल हज़रत इब्राहीम की तरह अल्लाह की ख़ुशनूदी के लिए समर्पित होगा . और अल्लाह की ख़ुशनूदी अल्लाह का तक़वा इख़तियार करने से होगी.

क़ुरान में अल्लाह पाक का फ़रमान है:

“नहीं पहुँचते अल्लाह को उनके (क़ुर्बानी के जानवरों के ) गोश्त और उनके ख़ून , परन्तु उसे पहुँचता है तुम्हारा तक़वा (आज्ञा पालन). इसी प्रकार, उस (अल्लाह) ने उन (पशुओं) को तुम्हारे वश में कर दिया है, ताकि तुम अल्लाह की महिमा का वर्णन करो, उस मार्गदर्शन पर जो तुम्हें दिया है और नेकी करने वालों को ख़ुशख़बरी सुना दें. (सूरह अल-हज , आयत-37) ”

स्पष्ट है कि क़ुरबानी महज़ अल्लाह के नाम पर जानवरों को क़ुर्बान करने का नाम नहीं है बल्कि अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ उसके सन्मार्ग पर चलने के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान कर देने के लिए तैयार रहने का नाम है . अफ़्सोस की बात है कि आज के दौर हम में से अक्सर लोग क़ुर्बानी के मक़सद को भूल कर इसे सिर्फ़ जानवरों को क़ुर्बान करने की रस्म तक महदूद ( सीमित) कर चुके हैं.

रमज़ान के रोज़ों की तरह ही क़ुर्बानी का मक़सद भी तक़वा हासिल करना है क्यूंकि तक़वा से ही नेक अमल करने, बुराई से बचने और अपनी ग़लत ख़्वाहिशों को क़ुर्बान करने का हौसला मिलता है. तक़वा ही हमें रियकारी और नमूद-ओ-नुमाइश (दिखावा ) जैसे ख़ुदा की नाराज़गी का सबब बनने वाले अवगुणों से दूर रखता है.”

चलते-चलते कोरोना काल में जानवरों की क़ुर्बानी और ईद की नमाज़ पर भी कुछ बात कर लेते हैं:

 इदुल्फ़ित्र के मौक़े पर कोरोना की महामारी के फैलने की वजह से मैं ने भी ईद निहायत सादगी से मनाने की अपील की थी. कई मज़हबी इदारों और शख़्सियात ने ईद की नमाज़ बा-जमा-अत की जगह अपने-अपने घरों में नफ़िल नमाज़ अदा करने की तलक़ीन की थी और आवाम ने इस पर अमल भी किया था . जब कि उस वक़्त कोरोना से संक्रमित मरीज़ों की संख्या देश में एक लाख से कम थी और आज यह संख्या 15 लाख पार कर चुकी है. लिहाज़ा आज एहतियात करने की ज़रूरत और ज़्यादा हो गई है .

इसलिए ईद-अल-अज़हा भी हमें निहायत सादगी से मनाना चाहिए और इस मौक़े पर Lock Down से प्रभावित लोगों की ज़्यादा से ज़्यादा माली मदद करके अल्लाह पाक की रज़ा हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए . अब रही बात जानवरों की क़ुर्बानी की तो आज के माहौल में क़ुर्बानी के जानवरों का बाज़ार तो लगने वाला नहीं है और ज़्यादातर लोग क़ुर्बानी के चंद दिनों पहले ही क़ुर्बानी का जानवर ख़रीदते हैं तो जानवर नहीं मिलने से क़ुर्बानी मुमकिन नहीं है .

हाँ जिन लोगों के घरों में क़ुर्बानी के जानवर मौजूद हैं शायद उन्हें कोई दुशवारी नहीं हो. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर हम इस कोरोना काल में क़ुर्बानी नहीं कर पायें तो क्या क़ुर्बानी के लिए जो रक़्म हमारे पास है उस रक़्म को हम ज़रूरतमंदों की मदद के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं ? इस विषय पर काफ़ी अध्ययन करने के पश्चात मुझे पाकिस्तान के मशहूर युवा इस्लामिक स्कॉलर जनाब रेहान अहमद युसुफ़ी उर्फ़ अबू यहया के ख़्यालात मुनासिब और क़ाबिल-अमल लगे . जनाब अबू यहया ने इस विषय पर एक ख़ातून (महिला) के एक सवाल के जवाब में तहरीर किया है कि:

“´क़ुर्बानी एक इबादत है , हर इबादत की एक हक़ीक़त और इसका एक मक़सद होता है जो इस इबादत को बे-ऐनिहि ( जूँ का तूँ / हू-बहू ) अदा करने से हासिल होता है . क़ुर्बानी की हक़ीक़त अपने वजूद को अपने ख़ालिक़ (Creator) के हवाले कर देने का नाम है और इसका मक़सद इस जज़्बे का इज़हार है कि मालिक के लिए कभी जान भी देनी पड़ी तो क़ुर्बानी के जानवर की तरह हम भी बे-दरेग़ (नि:संकोच) अपना ख़ून बहा देंगे. ज़ाहिर है कि यह मक़सद कभी सादा तरीक़े से माल ख़र्च करने से हासिल नहीं हो सकता .

इसलिए यह तो मुमकिन नहीं कि क़ुर्बानी के पैसे किसी और नेकी में ख़र्च करके क़ुर्बानी का जज़्बा पैदा किया जा सके. ताहम (फिर भी) अहम बात यह है कि क़ुर्बानी अपनी नोयत के लिहाज़ से कोई लाज़मी / वाजिब (अनिवार्य) दीनी मुतालबा नहीं है. इस मामले में सबसे सख्त़ मौक़िफ़ अहनाफ़ का है मगर वह भी इसे साहिब-ए-निसाब के लिए वाजिब समझते हैं , जबकि जम्हूर के नज़दीक तो यह एक नफ़िल ( Optional) इबादत है . इसलिए इस वर्ष अगर क़ुर्बानी के पैसों से ग़रीबों की मदद की जाये तो यह अपनी ज़ात में एक अच्छी सोच है क्यूँकि हक़ीक़त में इस वर्ष कोरोना की रोकथाम के लिए Lock Down की वजह से बेशुमार लोगों के माली मसाएल (Financial Problems) बहुत बढ़ चुके हैं और बेशुमार लोग जो बीमार हैं उनके पास इलाज के लिए भी पैसे नहीं हैं, ऐसे में इस वर्ष अगर क़ुर्बानी को इस भावना से मौक़ूफ़ करके कोई इन पैसों से ग़रीबों की मदद कर देता है तो मुझे उम्मीद है कि इंशाल्लाह उसे क़ुर्बानी का भी अज्र मिलेगा और अल्लाह की राह में ख़र्च करने का भी अज्र मिलेगा.”

आज के हालात को सामने रखकर, मस्लकी तास्सुब से अलग हो कर अगर देखें तो अबु यहया साहेब की यह तहरीर यक़ीनन क़ाबिल-ए-ग़ौर ही नहीं बल्कि क़ाबिल-ए-अमल भी है. ऐसी ही राय एक और इस्लामिक स्कॉलर जनाब जावेद अहमद ग़ामिदी की भी है. उनका भी मानना है कि आज के हालात कोविड-19 की महामारी की वजह से नॉर्मल नहीं हैं इसलिए क़ुर्बानी में ख़र्च की जाने वाली रक़्म से ज़रूरतमंदों की मदद करने में हर्ज नहीं है !


उपरोक्त लेख लोकभारत टीम द्वारा संपादित नहीं किया गया है। लोकभारत का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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