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‘हिन्दू’ किसी पंथ, संप्रदाय का नाम नहीं है: मोहन भागवत

नागपुर। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि हिन्दू’ किसी पंथ, संप्रदाय का नाम नहीं है, किसी एक प्रांत का अपना उपजाया हुआ शब्द नहीं है, किसी एक जाति की बपौती नहीं है, किसी एक भाषा का पुरस्कार करने वाला शब्द नहीं है। ‘हिंदू’ शब्द के स्मरण से हमको एकात्मता के सूत्र में पिरोकर देश व समाज से बांधने वाला बंधन ढीला होता है।

विजय दशमी के अवसर पर संघ के मुख्यालय नागपुर में संघ के कार्यकर्ताओं को अपने संबोधन में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि इस देश व समाज को तोड़ना चाहने वाले, हमें आपस में लड़ाना चाहने वाले, इस शब्द को, जो सबको जोड़ता है, अपने तिरस्कार व टीका टिप्पणी का पहला लक्ष्य बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि ‘हिन्दुत्व’ ऐसा शब्द है, जिसके अर्थ को पूजा से जोड़कर संकुचित किया गया है। संघ की भाषा में उस संकुचित अर्थ में उसका प्रयोग नहीं होता। वह शब्द अपने देश की पहचान को, अध्यात्म आधारित उसकी परंपरा के सनातन सातत्य तथा समस्त मूल्य सम्पदा के साथ अभिव्यक्ति देने वाला शब्द है।

संघ प्रमुख ने कहा कि ‘हिंदुत्व’ शब्द भारतवर्ष को अपना मानने वाले, उसकी संस्कृति के वैश्विक व सर्वकालिक मूल्यों को आचरण में उतारना चाहने वाले तथा यशस्वी रूप में ऐसा करके दिखाने वाली उसकी पूर्वज परंपरा का गौरव मन में रखने वाले सभी 130 करोड़ समाज बंधुओं पर लागू होता है।

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मोहन भागवत ने बिना किसी का नाम लिए बढ़ते अपराधों को लेकर कहा कि समाज में किसी प्रकार से अपराध की अथवा अत्याचार की कोई घटना हो ही नहीं, अत्याचारी व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों पर पूर्ण नियंत्रण रहे और फिर भी घटनाएं होती हैं तो उसमें दोषी व्यक्ति तुरंत पकड़े जाएं और उनको कड़ी से कड़ी सजा हो, यह शासन प्रशासन को सुनिश्चित करना चाहिए।

मोहन भागवत ने नागरिकता संशोधन कानून पर विरोध करने वालों पर भी निशाना साधा और कहा कि कुछ लोग इसकी आड़ में साम्प्रदायिकता भड़काना चाहते थे लेकिन सत्ता में बैठे लोगों ने उनके इरादों पर पानी फेर दिया। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस संक्रमण ने इस विषय को ही ढक दिया।

वहीँ कोरोना संक्रमण और चीन को लेकर संघ प्रमुख ने कहा कि इस महामारी के संदर्भ में चीन की भूमिका संदिग्ध रही यह तो कहा ही जा सकता है, परंतु भारत की सीमाओं पर जिस प्रकार से अतिक्रमण का प्रयास अपने आर्थिक सामरिक बल के कारण मदांध होकर उसने किया। वह तो सम्पूर्ण विश्व के सामने स्पष्ट है।

उन्होंने कहा, “भारत का शासन, प्रशासन, सेना तथा जनता सभी ने इस आक्रमण के सामने अड़ कर खड़े होकर अपने स्वाभिमान, दृढ़ निश्चय व वीरता का उज्ज्वल परिचय दिया, इससे चीन को अनपेक्षित धक्का मिला लगता है. इस परिस्थिति में हमें सजग होकर दृढ़ रहना पड़ेगा।”

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पड़ौसी देशो को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हम सभी से मित्रता चाहते हैं. वह हमारा स्वभाव है परन्तु हमारी सद्भावना को दुर्बलता मानकर अपने बल के प्रदर्शन से कोई भारत को चाहे जैसा नचा ले, झुका ले, यह हो नहीं सकता, इतना तो अब तक ऐसा दुःसाहस करने वालों को समझ में आ जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हमारी सेना की अटूट देशभक्ति व अदम्य वीरता, हमारे शासनकर्ताओं का स्वाभिमानी रवैया तथा हम सब भारत के लोगों के दुर्दम्य नीति-धैर्य का परिचय चीन को पहली बार मिला है।

संघ प्रतिवर्ष विजय दशमी के अवसर पर एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन करता है लेकिन इस बार संघ के कार्यक्रम पर भी कोरोना का असर रहा। कोरोना संक्रमण के कारण संघ ने अपने विजयदशमी कार्यक्रम में सिर्फ 50 स्वयंसेवको को शामिल होने की अनुमति दी थी।

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