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अभी हार नहीं मानेंगी इशरत की मां, आरोपियों को कोर्ट की क्लीनचिट के फैसले को देंगी चुनौती

नई दिल्ली। 15 जून 2004 को अहमदाबाद के बाहरी हिस्से में पुलिस द्वारा किये गए कथित एनकाउंटर में मारी गई 19 वर्षीय छात्रा इशरत जहां के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने आरोपी तीन पुलिस अधिकारीयों जीएल सिंघल, तरुण बरोट और अनजु चौधरी को क्लीनचिट देते हुए मामले से बरी कर दिया है।

सीबीआई कोर्ट द्वारा तीन आरोपियों को बरी किये जाने के बाद भी मृतक इशरत जहां की मां आगे की कानूनी लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रही हैं। इशरत जहां की मां शमीमा कौसर ने तय किया है कि वे सीबीआई कोर्ट द्वारा तीन आरोपियों को रिहा किये जाने के आदेश के खिलाफ अदालत जाएंगी।

उन्होंने कहा कि सारे सबूत मौजूद हैं। इशरत जहां का किसी संगठन से कभी कोई सरोकार नहीं था। वह मासूम छात्रा थी। उसे बलि का बकरा बनाया गया। हम इस मामले में आगे की लड़ाई लड़ेंगे।

वहीँ अभी हाल ही में इशरत जहां की मां शमीमा कौसर की वकील वकील वृंदा ग्रोवार ने बीबीसी से बातचीत में इस बात की पुष्टि की कि इशरत जहां फ़र्ज़ी एनकाउंटर मामले में आरोपियों को सीबीआई कोर्ट से रिहाई मिलने के खिलाफ आगे की कानूनी लड़ाई लड़ी जायेगी।

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वकील वृंदा ग्रोवार ने कहा कि “मृतक इशरत का अपहरण किया गया, दो दिन तक अवैध तरीक़े से हिरासत में रखा गया और फिर जान से मार दिया गया था। सीबीआई ने जिन गवाहों और फ़ॉरेंसिक और वैज्ञानिक सबूतों को इकट्ठा किया है वे इसकी पुष्टि करते हैं।”

उन्होंने कहा कि इशरत जहां के किसी भी आतंकी गतिविधि से संबंधों के कोई सबूत नहीं हैं। रिकॉर्ड में मौजूद सभी सबूतों को दरकिनार करते हुए सीबीआई अदालत को गुजरात सरकार ने जो अपना विवरण पेश किया है उस पर भरोसा जताया गया है। शुरुआत से लेकर आख़िर तक कोर्ट के बाहर और अंदर गुजरात सरकार ने गुजरात पुलिस के आरोपियों का बचाव किया है।”

क्या है मामला:

गौरतलब है कि 19 वर्षीय छात्रा इशरत जहां, जावेद शेख उर्फ प्रणेश पिल्लई, अमजद अली अकबर अली राणा और जीशान जौहर को 15 जून 2004 को अहमदाबाद के बाहरी हिस्से में पुलिस ने एक कथित फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था। पुलिस ने दावा किया था कि चारों आतंकवादी थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने आए थे।

इस मामले में सीबीआई ने 20 मार्च को अदालत को सूचित किया था कि राज्य सरकार ने तीनों आरोपियों के खिलाफ अभियोग चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने अक्तूबर, 2020 के आदेश में टिप्पणी की थी उन्होंने (आरोपी पुलिस कर्मियों) ‘आधिकारिक कर्तव्य के तहत कार्य’ किया था, इसलिए एजेंसी को अभियोजन की मंजूरी लेने की जरूरत है।

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(इनपुट बीबीसी से भी)

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