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हैदराबाद एनकाउंटर : कितना जायज, कितना गलत

नई दिल्ली। हैदराबाद में रेप और हत्या के आरोपियों के पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने की घटना के बाद कई ऐसे सवाल पैदा हो गए हैं जिनके जबाव ढूंढना बेहद जरूरी है।

एनकाउंटर को लेकर पुलिस जो थ्योरी बता  रही है वह हालातो से मेल नही खाती। पुलिस जिस क्राइम सीन के रिक्रिएशन की बात कह रही है वही कई शंकाओ को जन्म देने वाला है।

अहम सवाल यही से शुरू होते हैं कि आखिर पुलिस ने क्राइम सीन रिक्रिएट करने के लिए देर रात का समय ही क्यों चुना। दूसरा अहम सवाल यह है कि जब मौके पर बड़ी तादाद में पुलिसबल तैनात था तो आरोपियों ने भागने की कोशिश क्यो की होगी।

तीसरा अहम सवाल यह भी है जब मौके पर बड़ी तादाद में पुलिसबल मौजूद था तो आरोपियों को जिंदा क्यो नही पकड़ा जा सका और किन कारणों से उनपर गोलियां चलाई गयीं।

हैदराबाद पुलिस ऊपर लिखे तीन सवालो का जबाव कुछ भी दे लेकिन यह भी सच है कि आरोपियों का एनकाउंटर करके हैदराबाद पुलिस ने अन्य राज्यो की पुलिस के लिये भी एक नया अध्याय लिख दिया है और भविष्य में अन्य राज्यो में भी इस तरह के मामले सामने आ सकते हैं।

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ऐसा नही है कि इस देश मे पहली बार कोई एनकाउंटर हुआ है या पहली बार कोई रेप और हत्या की घटना हुई है लेकिन रेप आरोपियों के साथ दो तरह का व्यवहार अपने आप मे सवाल पैदा करने वाला है।

रेप आरोपी बड़े बड़े नाम वाले लोग जेल में वर्षो से मजे कर रहे हैं। गरीब परिवारों से जुड़े चार युवाओं पर आरोप सिद्ध होने से पहले ही मार दिया जाता है, ज़ाहिर है कि सवाल तो उठेंगे ही।

जहां तक कानून का सवाल है तो पुलिस को ये हक नही कि वह कानून अपने हाथ मे लेकर किसी की सजा निर्धारित करे, यह कोर्ट का काम है।

हमारे देश मे किसी भी अपराधी पर आरोप साबित करने की एक प्रक्रिया निर्धारित की गई है। अपराध छोटा हो या बड़ा , ट्रायल की प्रक्रिया से सभी अपराधियों को गुजरना होता है लेकिन हैदराबाद में पुलिस ने ट्रायल होने से पहले ही आरोपियों का एनकाउंटर करके कानूनी प्रक्रिया पूरी होने का रास्ता बंद कर दिया है।

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