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अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक को 200 करोड़ की मानहानि का नोटिस

नई दिल्ली। फ़र्ज़ी टीआरपी मामले में फंसे रिपब्लिक टीवी को लेकर अब एक और नया खुलासा हुआ है। फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत मामले को लगातार चलाकर टीआरपी जमा करने वाले रिपब्लिक टीवी और उसके एडिटर इन चीफ पर खबर दिखाने के लिए पैसे मांगने का आरोप लगा है।

सुशांत के करीबी रहे फिल्म निर्माता संदीप सिंह के मुताबिक सुशांत सिंह राजपूत की मौत मामले में उसे बदनाम करने की कोशिश की गई तथा पैसे नहीं देने पर उसके खिलाफ तथ्यहीन खबर चलाई गई।

पीएम नरेंद्र मोदी की बायोपिक बनाने वाले संदीप सिंह ने रिपब्लिक टीवी और चीफ एडिटर अर्नब गोस्वामी पर तथ्यहीन खबरों के ज़रिये अपनी छवि ख़राब करने की कोशिशों का आरोप लगाते हुए 200 करोड़ की मानहानि का नोटिस भी भेजा है।

लीजेंड ग्लोबल स्टूडियो के नाम से प्रोडक्शन हाउस चलाने वाले संदीप सिंह पीएम नरेंद्र मोदी की बायोपिक बनाने के अलावा अलीगढ़, भूमि और सरबजीत जैसी फ़िल्में भी बना चुके हैं।

बिहार से ताल्लुक रखने के कारण उन्हें मृतक अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का करीबी दोस्त माना जाता है। संदीप सिंह का दावा है कि रिपब्लिक टीवी ने उनको “आपराधिक इरादे” और जबरन वसूली के इरादे से कई संदेश भेजे हैं और इसके साक्ष्य उनके पास मौजूद हैं।

संदीप सिंह ने यह आरोप भी लगाया है कि रिपब्लिक टीवी के अधिकारियों में से एक उनके संपर्क में था और उसने उनसे कहा था कि जब तक वह “वित्तीय रूप से चैनल को लाभ” देने के लिए सहमत नहीं होंगे, तब तक उनके ख़िलाफ़ ख़बर चलाई जाएगी और ऐसा हकीकत में हुआ भी क्योंकि चैनल द्वारा उनके ख़िलाफ़ बिना आधार या तथ्यों वाली ख़बरें चलाई गयीं।

महाराष्ट्र सरकार भी भेज चुकी है नोटिस:

वहीँ महाराष्ट्र सरकार ने भी अर्नब गोस्वामी को विशेषाधिकार हनन मामले में दूसरा नोटिस भेजकर तलब किया है। पहले नोटिस के अनुसार, अर्णब को पांच अक्टूबर तक जवाब देना था लेकिन उन्होंने नहीं दिया। महाराष्ट्र सरकार की तरफ से भेजे गए दूसरे नोटिस में अर्नब को 20 अक्टूबर तक का समय दिया गया है।

दूसरी तरफ टीआरपी घोटाले मामले में दर्ज की गई एफआईआर पर मुंबई पुलिस की ओर से जारी समन आदेश के खिलाफ रिपब्लिक टीवी की याचिका पर सुनवाई से उच्चतम नयायालय ने इंकार कर दिया और उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट जाने की सलाह दी। न्यायमूर्ति चंद्रचुड़ ने कहा, “हमें अपने उच्च न्यायालयों पर भरोसा रखना चाहिए। उच्च न्यायालयों के हस्तक्षेप के बिना सुनवाई से एक खराब संदेश जाता है।’’

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