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ग्राउंड जीरो: उपचुनाव में किसान फिर बनेगे बीजेपी के लिए सिरदर्द

भोपल ब्यूरो। मध्य प्रदेश में होने वाले 24 सीटों के उपचुनाव के लिए कांग्रेस और बीजेपी अपने अपने मोहरे सैट करना शुरू कर दिया है। कोरोना संक्रमण के कारण सोशल डिस्टेंसिंग दोनों दलों के लिए मुश्किल अवश्य है इसके बावजूद परदे के पीछे सभी राजनैतिक गतिविधियां चल रही हैं।

जिन 24 सीटों पर उपचुनाव होना है उनमे से 9 सुरक्षित सीटें शामिल हैं। इनमे 8 सीटें अनुसूचित जाति और एक सीट अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के लिए आरक्षित हैं।

उपचुनाव के लिए बीजेपी ग्राउंड ज़ीरो पर अपना काम शुरू कर चुकी हैं। वहीँ अगले महीने से ग्राउंड जीरो पर अपना काम शुरू करेगी। माना जा रहा है कि यह देरी चुनाव विशेषज्ञ प्रशांत किशोर के कारण हुई है, साथ ही अब तक कांग्रेस का पूरा फोकस राज्य सभा चुनाव पर भी था।

जहां तक ग्राउंड ज़ीरो का सवाल है तो इस बार भी किसान और मजदूरों की नाराज़गी चुनाव में बीजेपी के लिए बड़ा व्यवधान बन सकती है। कोरोना संक्रमण के कारण हुए लॉकडाउन में वापस आये लाखो प्रवासी मजदूरों की एक बड़ी तादाद काम न मिलने के कारण हाथ पर हाथ रखे बैठी है। वहीँ किसान बीजेपी से पहले से ही नाराज़ हैं और अब मक्का किसानो का मामला भी तूल पकड़ता जा रहा है।

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने पहले ही यह मामला उठाकर मध्य प्रदेश सरकार को अपने इरादे जता दिए हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने ट्वीट कर कहा कि ‘मक्का का न्यूनतम मूल्य रु1850 प्रति कुण्टल हैं जब कि बाज़ार भाव रु900 से रु1000 प्रति कुण्टल है। नयी फसल भी सितंबर-अक्टूबर तक आ जाएगी तब तक आयातित मक्का आ जाएगी जिसके कारण भाव और कम हो जाएँगे। किसान को नुक़सान और मक्का प्रासेसर्ज़ को फ़ायदा। यही तो है मोदी के विकास का मॉडल।’

वहीँ दिग्विजय सिंह ने अगले ही ट्वीट में यह खुलासा भी कर दिया कि देश में जल्द ही आयातित मक्का भी आ जाएगी। उन्होंने कहा कि ‘सरकार विदेश से मक्का की खरीदी महज़ 15 फीसदी के आयात शुल्क पर करेगी। इससे भारत में मक्का की खेती करने वाले किसानों को बड़ा नुकसान होगा। अमूमन भारत में मक्का का आयात 60 फीसदी आयात शुल्क पर किया जाता है। अब महज़ 15 फीसदी पर मक्के का आयात किसानों के लिए परेशानी का सबब बन जाएगा।’

बीजेपी भले ही दिग्विजय सिंह की बात को हलके में ले रही हो लेकिन उन्होंने जिस मुद्दे को कुरेदा है वह बीजेपी के लिए मुश्किलें पैदा करने वाला है। वहीँ दूसरी तरफ कमलनाथ सरकार में चरणवद्ध तरीके से हो रहे किसानो के क़र्ज़ माफ़ को लेकर भी बीजेपी की टेंशन बढ़ सकती है।

करीब 15 महीने के कार्यकाल में कमलनाथ सरकार ने हज़ारो किसानो के क़र्ज़ माफ़ किये लेकिन इसके बावजूद क़र्ज़ माफ़ी के लिए अपना नंबर आने के इंतज़ार में लाखो किसान बैठे हैं। ऐसे में चुनाव में ये मुद्दा ज़रूर उठेगा कि सभी किसानो की कर्जमाफी इसलिए नहीं हो पाई क्यों कि बीजेपी ने कमलनाथ सरकार गिरवा दी।

एक हकीकत यह भी है कि सिंधिया परिवार के वफादार रहे कई नेता अब धीमे धीमे दूरी बना रहे हैं। वे ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने के फैसले से खुश नहीं हैं।

ग्राउंड जीरो की हकीकत यहीं समाप्त नहीं होती। जैसा कि माना जा रहा है कि बिहार विधानसभा के चुनाव अक्टूबर नवंबर में होने हैं। माना जा रहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव के आसपास ही मध्य प्रदेश में 24 सीटों के लिए उपचुनाव कराये जाएंगे।

जानकारों की माने तो मध्य प्रदेश चुनाव में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों दोनों पर चुनाव लड़ा जाता रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना संक्रमण के कारण दुनियाभर के देशो की अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही है। इसलिए फिलहाल ये सोचना गलत होगा कि अक्टूबर नवंबर तक देश की अर्थव्यवस्था में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा।

जानकारों के मुताबिक पेट्रोल डीजल की कीमतें जल्द कम होने वाली नहीं। यदि इनमे उतार आता भी है तो वह बहुत मामूली सा होगा और तेल की कीमतें फिर से पुराने भाव पर आकर रुकें ये संभव नहीं है। इसलिए पेट्रोल डीजल की कीमतों का तीर कांग्रेस के हाथ में होगा और वह इस मुद्दे पर बीजेपी को हर जगह घेरेगी।

मंदसौर में किसानों ने उग्र प्रदर्शन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उपवास पर बैठ गए थे लकिन किसानो की नाराज़गी दूर नहीं कर पाए थे।

ग्राउंड जीरो की एक और बड़ी हकीकत कोरोना काल से पैदा हुई बेरोज़गारी है। जिसे ढंकने की कोशिश की जा रही है लेकिन पेट की भूख को बहुत दिनों तक दबा कर नहीं रखा जा सकता। इसलिए 24 विधानसभा सीटों पर बेरोज़गारी एक बड़ा मुद्दा होगा।

वहीँ सबसे अहम बात यह है कि यदि 2018 के विधानसभा चुनाव में जनता शिवराज सरकार से नाराज़ नहीं थी तो बीजेपी की सत्ता में वापसी क्यों नहीं हुई। ज़ाहिर है कि मध्य प्रदेश की जनता ने बदलाव के लिए वोट दिया था लेकिन जनता की लगाई मुहर को बीजेपी ने उखाड़ फेंका और कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे कराये। यह मुद्दा कहीं न कहीं आगे जाकर उभरेगा और बीजेपी के अंदर अंतर्कलह पैदा करेगा।

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