साहित्य

गीता कुमारी की कविता: मां की ममता
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गीता कुमारी की कविता: मां की ममता

घुटनों से रेंगते-रेंगते कब पैरों पर खड़ी हुई तेरी ममता की छांव में जाने मैं कब बड़ी हो गई काला टीका दूध मलाई आज भी सब कुछ वैसा है मैं ही मैं हूं हर जगह प्यार ये तेरा कैसा है माँ की ममता बड़ी निराली जीवन में लाती है हरियाली जिसने भी समझी माँ की ममता खुशियों भरा जीवन वो है पाता सीधी-साधी भोली-भाली मैं ही सबसे अच्छी हूँ कितनी भी हो जाऊँगी बड़ी माँ मैं आज भी तेरी बच्ची हूँ (चरखा फीचर)...
बबिता जोसफ की कविता: मैं भी हूं एक इंसान
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बबिता जोसफ की कविता: मैं भी हूं एक इंसान

मैं भी हूं एक इंसान , तुम्हारी ही तरह उस परमपिता की संतान न जाने किसने छीन ली मुझसे मेरी ही पहचान। न रोटी है ,न कपड़ा है, न है मेरा कोई मकान, जन्मा हूँ फुटपाथ पर जाऊं कहाँ, नहीं है , मेरा कोई मुकाम क्यों है मेरी दुनिया वीरान। कभी मैं समझ न पाया , ये जिंदगी का इम्तिहान , कभी समझा न पाया , मैं कैसा अभागा इंसान। कभी एक रोटी को तरसता है तन, कभी यातनाओं में सिसकता है मन, हर ख्वाहिश पे निकलता है दम, जख्मी हृदय से रिसते हैं गम, शुष्क अधरों पे रात भर बरसते नयन, फिर भी प्यासा रह जाता है मन। बदलो अपनी सोच को , जिसने बनाया मुझे, मोहताज और बेजुबान, मेरे दुःखों से अब न रहो अनजान। भीख नहीं, मिले समाज में स्थान सिर्फ रोटी ही से कब जी पाता इंसान मिटे समाज के सारे भेद , हर इंसान हो एक समान मिले मुझे सदियों से , खोया मेरा आत्मसम्मान। खोलो सारे बंधन मेरे, बाहें खोल मैं ऊड़ूँ उड़ा...
बबिता जोसफ की कविता: ‘तृण – तृण जोड़ पक्षियों ने दरख़्त में गांव सलोना बसाया है’
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बबिता जोसफ की कविता: ‘तृण – तृण जोड़ पक्षियों ने दरख़्त में गांव सलोना बसाया है’

बादलों की छांव तले तृण-तृण जोड़ पंछियों ने दरख़्त पर गांव सलोना बसाया था। आंखों में सुंदर ख्वाब सजाया था। असफल प्रयासों में पर्ण तृण , धरा पर कई बार गिराया था। फिर भी धैर्य ,परिश्रम का सबक , सबने गले से लगाया था। हर चुनौती नें हौंसलों का , कद और भी बढ़ाया था। बेदर्द आंधियों ने बरपाया था कहर, चहकता था जीवन कल तक नीड में, तबाही का मंजर था आज , पंछियों की भीड़ में। ओ अबोध परिंदे ,आंधियों ने ढाए पहले भी कई बार शजर। उजड़ गया है जो तेरा घर तेरी खुशी यूं न जाए बिखर। देख उठती लहरों के तीव्र वेग नाविक भी तट पर घबराता है। थाम ले जो बढ़ कर पतवार , तूफां में साहिल वह पाता है। अंधेरी राहों में देखा है , कई बार जुगनुओं को , खुद जल कर राह जगमगाते हुए। लड़ी तमर की मरुभूमि में, मृदु रस खंड बरसाते हुए।। --बबिता जोसफ अपनी कविताओं से हिंदी काव्य के क्षेत्र में पहचान अर्जित करने वाली बबिता...
बबिता जोसफ की कविता: जीवन के काल चक्र में
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बबिता जोसफ की कविता: जीवन के काल चक्र में

भव के भव्य रंग मंच में हर शख्स को उसके कर्म विविध किरदार दे जाते हैं। जीवन के काल चक्र में इष्ट-अनिष्ट के संयोग-वियोग कभी हर्षित कभी शोकित कर जाते हैं। किसे तजें किसे भजें तटस्थ भाव से किरदार निभाते हर पात्र जगत से एक दिन विदा हो जाते हैं जीवन सुंदर हो फूलों सा रहकर कांटों की बस्ती में भी अपनी रंगबिरंगी काया से धरा पर सतरंगी इंद्रधनुष सजाते हैं। बहते समीर के झोंकों में पुष्प मृदु सुरभि कुम्भ छलकाते हैं लघु जीवन पाकर भी हर क्षण हर्ष के संदेशे भिजवाते हैं । --बबिता जोसफ हिंदी काव्य के क्षेत्र में पहचान बनाने वाली बबिता जोसफ अपनी कविताओं के माध्यम से सामयिक विषयो को रेखांकित करने के लिए जानी जाती हैं। वे अपनी कविताओं में दुनिया की वर्तमान स्थितियों और परिस्थितियों का सजीव चित्रण करती हैं। बबिता जोसफ के फेसबुक पेज से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें।...
बबिता जोसफ की कविता: ‘बजे अंश बांस का, वादन के क्षण’
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बबिता जोसफ की कविता: ‘बजे अंश बांस का, वादन के क्षण’

बजे अंश बांस का वादन के क्षण, बहे तेरी सांस , जब मुरली के अंग, स्वरों के स्पंदन से, झरें निर्झर प्रेम कण, झूमे तन प्रिय की धुन ढूंढे उसे प्रेम मुग्ध नयन छूटे सुख-दुःख , जग के बंधन बिसरे सुध-बुध तन और मन बजे हिय में प्रेम की सरगम बसे मन जब प्रेम रतन, मिटे निज से अंतर व द्वैत द्वन्द। तप्त धरा का सुन रुदन, तुम बरसो ,बन घन सघन, हिम कण के आलिंगन में हों परितृप्त ,निर्मल तृण, पर्ण। भवसागर के मंथन से , मिटे विष ,छलके अमृत कुंभ मन के शोधन से मिटे अहम् का तम छूटे तन के बंधन से, क्षेत्र और क्षण तत्क्षण मिटे निज से अंतर व द्वैत द्वन्द। मिटे मोह,लोभ ,क्रोध के क्षण , महके अंतर्मन जैसे चंदन वन परम प्रेम के दर्शन के क्षण मिटे निज से अंतर व द्वैत द्वन्द।। -- बबिता जोसफ...
बबिता जोसफ की कविता: श्वास अवरुद्ध, खामोशियों का घोर पहरा है
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बबिता जोसफ की कविता: श्वास अवरुद्ध, खामोशियों का घोर पहरा है

श्वास अवरुद्ध ,खामोशियों का घोर पहरा है शहर गतिरुद्ध ,तबाहियों का शोर पसरा है। स्तब्ध है मन,सदमों का असर गहरा है लाचार हैं जन,पैरों में ख़ौफ़ जकड़ा है बिछड़े हैं जन पहन अपरस कफन उजड़े हैं अमन , बने निर्झर नयन तप रही धरा, कंप रहा गगन धधक रही चिताऐं , है संतप्त पवन बिखरी है राख, घिर गया है तम जख्मी है मन , भर गया है गम उजड़ी धरा का सुन करुण रुदन बरस भी जा , बन करुण घन रहम करो अब हे भगवन बिलख रहे हैं, सब तेरे जन स्तब्ध है मन,सदमों का असर गहरा है फिर भी न जाने क्यों ये दिल कह रहा है बदलेगा वक़्त, वक़्त कब ठहरा है रात के बाद, रुका कब सबेरा है। - बबिता जोसफ बबिता जोसफ जानी मानी कवित्री हैं। वे कविताओं में अपनी पंक्तियों के ज़रिये हालातो और परिस्थितियों का वर्णन करने के लिए पहचानी जाती हैं। अपनी इस नई कविता में बबिता जोसफ ने कोरोना महामारी से दुनियाभर में पैदा हुए हालातो को बयां किया है...
बबिता जोसफ की कविता: हो गया बेबस बहुत आदमी
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बबिता जोसफ की कविता: हो गया बेबस बहुत आदमी

छोड़ दे दर्प सभी , जाग भी अब ए गिरी पिघल जाए दिल तेरा अब सही बह चले तेरे अश्रुओं से एक नदी हो गया बेबस बहुत अब आदमी मर के भी न मिल रही दो गज जमीं छिप गईं रेत में सब शफरियाँ, सिसक रही कीच में कुमुदनियाँ। मर गईं है अब सब इंद्रियां, उगल रही जहर चंद अशर्फियाँ। बिक रही हवा,बिक रहा नीर भी, मिट रही आस , घुट रही सांस भी, हो गया है बेबस बहुत अब आदमी, मर के भी न मिल रही दो गज जमीं बह चले तेरे अश्रुओं से एक नदी छोड़ दे दर्प सभी , जाग भी अब ए गिरी। ---बबिता जोसफ...
अंजुम बदायूंनी की ग़ज़ल “दिन की ज़ू, शब की चांदनी तुम से”
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अंजुम बदायूंनी की ग़ज़ल “दिन की ज़ू, शब की चांदनी तुम से”

दिन की ज़ू, शब की चांदनी तुम से यूं समझ लो कि ज़िन्दगी तुम से तुम से फूलों ने दिलकशी सीखी मैं ने सीखी है सादगी तुम से दौरे ज़ुल्मत से क्यूं डरूं आख़िर मेरे आंगन मे रौशनी तुम से तुम हो रंगत मेरे ख़यालो की मेरे अफ़कारे - बाहमी तुम से दिल नवाज़ी के सब हुनर दे कर सीख ली मै ने दिलबरी तुम से मेरे शेरों की रूह मे तुम हो दर हक़ीक़त यह शायरी तुम से आख़िरश मै ने सीख ली 'अन्जुम' क़ुव्वते - इश्क़े - दायमी तुम से (अंजुम बदायूंनी)...
नम्रता चौहान की कविता “ऑनलाइन शिक्षा मासूमो की परेशानी”
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नम्रता चौहान की कविता “ऑनलाइन शिक्षा मासूमो की परेशानी”

कमर का बोझ हुआ है हल्का आँखों पर आकर ठहरा है बच्चों के तन मन को देखो मोबाईलो ने घेरा है किससे अपना दर्द कहे पीड़ित हैं इस दर्द से ये जब सुनने वाला ही हो गया अंधा बहरा है!! गरीबों के बच्चे क्या ऐसे पढ़ाई कर लेंगे क्या ये मासूम बच्चे रेडिएशन से लड़ लेंगे क्या इन बच्चों की आँखों को ईश्वर ने वरदान दिया क्यूँ इन बच्चों को फिर इतना कठिन फरमान दिया !! कौनसी कीमत चुका कर हम ये शिक्षा दिलवाएंगे अपने कलेजे के टुकड़ो को कितने रोग लगाएंगे अनिद्रा, ब्रेन ट्यूमर जैसी बीमारी बहुत हैं घातक तनाव और नेत्र रोगों का रेडिएशन ही है उत्पादक!! मेरा कहना है बच्चों तक अब किताबें पहुंचाई जाएं जितनी जल्दी हो ये ऑनलाइन शिक्षा रुकवाई जाए वरना खतरनाक परिणाम अब हमारे सामने आएगे अपने बच्चों की जिंदगी से हम खेल नहीं पाएंगे !! वैसे भी ये शिक्षा पैसे वालों तक ही सीमित है जरा सोच कर देखो इसकी कि...
अंजुम बदायूनी की ग़ज़ल: चेहरे पे तेरे तेहरीरें कुछ
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अंजुम बदायूनी की ग़ज़ल: चेहरे पे तेरे तेहरीरें कुछ

ग़ज़ल चेहरे पे तेरे तेहरीरें कुछ होटों पे मगर तफसीरें कुछ आँखों में चमकते ख्वाब कई खामोश मगर ताबीरें कुछ क्यूँ देती हैं दस्तक रह रह कर नजरों में भरी तस्वीरें कुछ है माइले बकशिश शाने खुदा हम भी तो करें तदबीरें कुछ कांधों पे सुनहरा दौर लिए हैं सहमी हुई तकदीरें कुछ फिर शौक हुआ सरकश 'अंजुम' खामोश हुईं ज़न्जीरें कुछ...