चुनाव बड़ी खबर बिहार-झारखंड राज्य

सितंबर-अक्टूबर तक हुए चुनाव तो डूब जाएगा नीतीश-बीजेपी का किला

नई दिल्ली। बिहार में इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। कोरोना महामारी के बीच विधानसभा चुनाव कराये जाने के लिए चुनाव आयोग ने राजनैतिक दलों से सुझाव भी मांगे हैं। चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ा सवाल कोरोना काल में जनसभाओं और चुनाव प्रचार को लेकर है।

बिहार चुनाव आयोग द्वारा पिछले दिनों बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी इस बात पर चर्चा हुई कि यदि कोरोना महामारी के बीच विधानसभा चुनाव कराये जाएँ तो राजनीतिक दल अपना चुनाव प्रचार किस तरह कर सकते हैं। इस सवाल पर सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधियों ने डिजिटल रैलियों के आयोजन का समर्थन किया, वहीँ विपक्षी दलों ने डिजिटल रैलियों के सुझाव को ख़ारिज कर दिया था।

विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों का कहना था कि डिजिटल रैलियों का आयोजन सभी दलों के लिए संभव नहीं है और इसे बिहार के हर इलाके में आयोजित नहीं किया जा सकता।

बीजेपी-जेडीयू चाहते हैं डिजिटल चुनाव:

सूत्रों की माने तो सत्तारूढ़ जेडीयू और बीजेपी कोरोना काल में ही विधानसभा चुनाव कराये जाने के पक्षधर हैं। इतना ही नहीं दोनों चुनाव प्रचार के लिए पार्टियां डिजिटल रैलियां कराये जाने के सुझाव से भी सहमत है। हालांकि विपक्ष इसके लिए तैयार नहीं हैं।

वहीँ जानकारों की माने तो जेडीयू और बीजेपी को बिहार में चुनाव कराये जाने की जल्दी इसलिए भी है जिससे विपक्ष को प्रचार करने का मौका ही न मिले। जानकारों के मुताबिक डिजिटल रैलियों के आयोजन से राज्य में सरकार के विरोध को छिपाया जा सकेगा। वहीँ यदि सामान्य तौर पर चुनाव हुए और जनसभाओं के आयोजन की अनुमति मिली नीतीश और बीजेपी के खिलाफ जनता में भरा हुआ गुस्सा ज़मीन पर दिखाई देने लगेगा, जिसका सरकार विरोधी लहर में परिवर्तित होना तय माना जा रहा है।

जनता को बताने के लिए नहीं है कोई बड़ी उपलब्धि:

नीतीश कुमार बिहार के पिछड़ेपन के लिए अब लालू-राबड़ी को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते। नीतीश कुमार स्वयं बिहार के कई बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इसके बावजूद बिहार ने कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की है। बिहार आज भी आर्थिक और औद्योगिक रूप से पिछड़ा हुआ है।

वहीँ आकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी नीतीश काल में बिहार ने कोई बड़ी तरक्की नहीं की है। जहां तक रोज़गार का सवाल है तो इसमें भी बिहार की स्थति में कोई सुधार नहीं हुआ है। कोरोना संक्रमण के बीच हुए लॉकडाउन में वापस लौटे प्रवासी मजदूरों की तादाद इस बात पर मुहर लगाती है कि बिहार में रोज़गार के पर्याप्त अवसर नहीं हैं।

चुनाव में सरकार का सिरदर्द बनेंगे प्रवासी मजदूर:

विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी और जेडीयू नेता कुछ भी दावा करें लेकिन ज़मीनी हकीकत उनके दावों से मेल नहीं खाती। ज़मीनी स्तर पर जेडीयू और बीजेपी का विरोध लगातार बढ़ रहा है। लाखो प्रवासी मजदूर जो अपने कामकाज छोड़कर वापस लौटे हैं, वे बीजेपी-जेडीयू कोई सबसे बड़ी सिरदर्दी हैं।

अल्पसंख़्यको और दलितों का भरोसा टूटा :

नीतीश कुमार की सेकुलर छवि के चलते पिछले कई चुनावो में बिहार के अल्पसंख़्यको और दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा जेडीयू के साथ था, लेकिन बिहार में मॉब लिंचिंग की तबाड़तोड़ घटनाओं से नीतीश कुमार पर भरोसा करने वाला अल्पसंख्यक और दलित मतदाता उनसे दूर जा चुका है। ज़मीनी हकीकत बताती है कि बिहार का अल्पसंख्यक मतदाता तो उसी समय जेडीयू से दूर होना शुरू हो गया था जब नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़कर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी।

चौंकाने वाले होंगे परिणाम:

243 विधानसभा सीटों वाले बिहार में कुल मतदाताओं की संख्या 7,18,22,450 है। जिसमे पुरुष मतदाताओं की संख्या 3,79,12,127 तथा महिला मतदाताओं की संख्या 3,39,07,979 तथा थर्ड जेंडर मतदाताओं की संख्या 2,344 है।

चुनावी जानकारों का कहना है कि यदि बिहार में सितंबर-अक्टूबर तक सामान्य तरह से विधानसभा चुनाव हुए तो जेडीयू-बीजेपी का किला डूबना तय है। जानकारों के मुताबिक कोरोना संक्रमण के दौरान प्रवासी मजदूरों के साथ नीतीश सरकार की बेरूखी अभी जनता को याद है और इसका असर चुनाव में भी दिखेगा।

वहीँ विधानसभा चुनाव में बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के अलावा राज्य की कानून व्यवस्था जैसे बड़े मुद्दे उभर कर सामने आएंगे। इतना ही नहीं बिहार में बाढ़ से परेशांन हुई जनता अपना गुस्सा चुनावो में मतदान के समय दिखा सकती है। संक्षिप्त में यदि कहा जाए तो नीतीश को बीजेपी का साथ महंगा पड़ सकता है।

यशवंत सिन्हा भी देंगे चुनौती:
बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार यशवंत सिन्हा भी अपनी नई पार्टी के साथ मैदान में होंगे। यशवंत सिन्हा पूर्व में बीजेपी में रहे हैं। ऐसे में ये माना जा सकता है कि वे बिहार में बीजेपी के चिरपरिचित मतदाता को अपनी पार्टी से जोड़ने की कोशिश करेंगे। हालांकि संभावना यह भी है कि यशवंत सिन्हा की नई पार्टी भी अंत में महागठबंधन क,का हिस्सा बन जाए लेकिन फिलहाल अभी इस तरह के कोई संकेत नहीं हैं।

हालांकि बीजेपी-जेडीयू की रणनीति है कि किसी तरह से विपक्ष एकजुट न हो और सेकुलर मतों के बंटवारे का लाभ मिले। वहीँ दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी भी बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना रही है। हालाँकि बिहार में आम आदमी पार्टी का संगठन अभी प्रदेश में इस लायक नहीं है कि पार्टी किसी का वोट काट सके लेकिन ऐसी स्थति में बीजेपी का शहरी मतदाता उससे छिटक सकता है।

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