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अंजुम बदायूनी की ग़ज़ल: जो तू नहीं तो ज़िंदगी में रंग क्या, कमाल क्या

ग़ज़ल


(अंजुम बदायूनी)

जो तू नहीं तो ज़िन्दगी मे रंग क्या, कमाल क्या

वो *चर्ख़े-सुब्हो-शाम क्या, वो रोज़ो, माहो, साल क्या

तरक़्क़ियों का शौक़ क्या, *तनज़्ज़ुली का ख़ौफ़ क्यूं

के *मुख़्तसर हयात में *उरूज क्या, *ज़वाल क्या

ये तंगो-सख़्त रास्तों पे क्या जुदाई और मिलन

*वजूद की हो जंग तो *फ़िराक़ क्या, *विसाल क्या

फ़क़ीरे-दिल मोहब्बतों की इन्तेहा तमाम कर

मुक़ाम वो बना जहां *जमाल क्या, *जलाल क्या

जुनूने-शौक़ अड़चनों के ख़ौफ़ से डरा है कब

*कोहकन के सामने है *कोह क्या, *जिबाल क्या

जो राहे-हक़ पे चल पड़े तो मुड़ के देखना भी क्यूं

वो *क़स्र क्या, *महाल क्या, वो *दश्त क्या, *ग़ज़ाल क्या

दिलों की दास्तां अजीब दास्तान है जहां

वो हुस्ने-बे-मिसाल क्या, वो इश्क़े-बा-कमाल क्या


चर्ख़े सुब्हो शाम : सुब्ह, शाम का Cycle
तनज़्ज़ुली: पतन (Downfall)
मुख़्तसर हयात: छणिक जीवन (Limited life)
उरूज: उत्थान, ज़वाल: पतन
वजूद: अस्तित्व, फ़िराक़: वियोग
विसाल:मिलन, जमाल:सौंदर्य, जलाल:प्रताप
कोहकन: पहाड़ काटने वाला, कोह: पहाड़,
जिबाल: पर्वत माला, क़स्र: राजभवन, महाल: महल, दश्त: वन ग़ज़ाल: हिरन

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