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अयोध्या विवाद: मुकदमा हारे तो भी बहुत कुछ जीत जाएंगे मुस्लिम पक्षकार

नई दिल्ली (राजाज़ैद)। अयोध्या में विवादित भूमि के मालिकाना हक के मामले में सुप्रीमकोर्ट में चल रही सुनवाई 40वे दिन पूरी हो गयी। अब सभी की नज़रें फैसले पर टिकी हैं।

विवादित ज़मींन पर फैसला किसके हक में आएगा ये कोर्ट का फैसला आने के बाद ही पता चलेगा लेकिन फिलहाल बाबरी मस्जिद के पक्षकार इकबाल अंसारी ने साफ़ किया है कि राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीमकोर्ट का जो भी फैसला आएगा, उसे मुस्लिम पक्षकार स्वीकार करेंगे और यदि फैसला मुसलमानो के खिलाफ जाता है तब भी वे वे दोबारा अपील दायर नहीं करेंगे।

विवादित भूमि के मालिकाना हक को लेकर वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में 40 दिन तक चली सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारो द्वारा रखी गयी दलीलों से एक बात बड़े साफ़ तौर पर कही जा सकती है कि मुस्लिम पक्षकारो के वकील ने अपनी दलीलों को आखिर तक मजबूती से पेश किया और वे प्रतिद्वंदी पक्ष के वकीलों पर हावी रहे।

इस बात के कई मायने हैं। पहले यह कि फैसला यदि मुस्लिम पक्षकारो के फेवर में नहीं आता तो उन्हें इस बात का मलाल नहीं होगा कि उन्होंने यह लड़ाई पूरी नहीं लड़ी। दूसरी अहम् बात यह है कि अयोध्या मामले को सुप्रीमकोर्ट तक लाकर मुस्लिम समुदाय ने जोर ज़बरदस्ती का खेल खत्म कर दिया है।

जब अयोध्या की विवादित भूमि को लेकर समझौते की पहल हुई थी तो कई मुस्लिम बुद्धजीवियों ने सवाल उठाया था कि यदि किसी स्थति में मुसलमान बाबरी मस्जिद की जगह पर अपना दावा छोड़ दें और विवादित ज़मींन राम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दू पक्षकारो को दे दें तो इस बात की क्या गारंटी है कि कल देश की अन्य मस्जिदों को भी जोर ज़बरदस्ती से नहीं मांगा जायेगा।

मुस्लिम बुद्धजीवियों की बात जायज इसलिए भी थी क्यों कि विश्व हिन्दू परिषद जैसे हिन्दू संगठन काशी और मथुरा की मस्जिदों को लेकर भी दावे भरते रहे हैं।

ऐसे में जब अयोध्या मामला सुप्रीमकोर्ट तक पहुँच गया और कोर्ट का फैसला दोनों पक्ष मानने को राजी हो गए हों तो यहाँ जोर ज़बरदस्ती का खेल समाप्त हो जाता है। यदि भविष्य में कोई संगठन किसी धार्मिक स्थल पर अपना दावा करता है तो अब उसे एक कानूनी प्रक्रिया को पार करके जाना होगा।

दूसरा यह कि अब यह भी साफ़ हो गया कि धार्मिक स्थलों से जुडी ज़मीनो के मुकदमो में आस्था की कोई जगह नहीं और ऐसे मामले देश की किसी भी कोर्ट में जाएंगे तो उनमे आस्था और ग्रंथो के आधार पर नहीं बल्कि सबूतों के आधार पर फैसले सुनाये जायेंगे।

अयोध्या के विवादित भूमि के मामले को सुप्रीमकोर्ट तक लड़कर मुसलिम पक्षकारो ने एक नया सिस्टम तैयार कर दिया है। जो भविष्य में कहीं न कहीं उनके काम आएगा।

अस्थाई मंदिर का क्या होगा ?

सुप्रीमकोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद अभी भी कई सवाल ऐसे हैं जिनके जबाव सुप्रीमकोर्ट के फैसले से ही मिल सकते हैं। पहला सवाल यह है कि यदि फैसला मुस्लिम पक्षकारो के पक्ष में जाता है तो मुस्लिम पक्षकारो को कितनी ज़मीन मिलेगी ? क्या उस ज़मीन में विवादित स्थल पर बने राम लला के अस्थाई मंदिर का हिस्सा भी आता ै ? यदि हां तो रामलला के मंदिर का क्या होगा ? उसे कहीं शिफ्ट किया जाएगा ? यदि हा तो कहाँ शिफ्ट किया जाएगा ?

यदि सरकार अध्यादेश लाती है तो क्या होगा ?

सुप्रीमकोर्ट में अयोध्या की विवादित ज़मीन की सुनवाई पूरी होने के बाद दूसरा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सुप्रीमकोर्ट का फैसला मुस्लिम पक्षकारो में हक में जाने पर सरकार कोई अध्यादेश लाकर देश की सर्वोच्च अदालत के निर्णय को बदल सकती है ?

क्या सरकार देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले को बदलकर न्यायालय के खिलाफ जायेगी ? यदि ऐसा होता है तो इस वक़्त देश की सर्वोच्च अदालत कहे जाने वाले सुप्रीमकोर्ट की भूमिका क्या होगी ?

अगर फैसला हिन्दू पक्षकारो के हक में गया तो ?

अयोध्या की विवादित ज़मींन के मालिकाना हक़ का फैसला यदि हिन्दू पक्षकारो के हक में गया तो यह ज़मीन किसे दी जाएगी ? क्योंकि हिंदू पक्ष की तरफ से एक दर्जन दावेदार हैं।

सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारो के वकील राजीव धवन यह सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने 14 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान सवाल किया था कि मुसलिम पक्षकारो की तरफ से एक ही पार्टी है जबकि हिन्दू पक्षकारो की तरफ से शुरू में निर्मोही आखाड़ा ही पक्षकार था लेकिन अब 14 पक्षकार सामने आ चुके हैं।

धवन का सवाल था कि इतने पक्षकारो के बीच यह कैसे तय होगा कि इनमे से कौन सा पक्ष मंदिर निर्माण करना चाहता है। धवन ने कोर्ट को बताया कि विश्व हिन्दू परिषद द्वारा बनाए गए राम जन्मभूमि न्यास ने सारी विवादित भूमि पर स्वामित्व का दावा पेश किया है, जबकि न्यास तो सिर्फ एक ऐसे मामले में बचाव पक्ष है जो काफी बाद में दायर किया गया था।

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