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6 दिसंबर: बाबरी मस्जिद ढहाकर बोया गया था सांप्रदायिक राजनीति का बीज

नई दिल्ली(राजाज़ैद) : 6 दिसंबर 1992 को सिर्फ बाबरी मस्जिद ही नहीं बल्कि करोडो मुसलमानो के दिल भी टूटे। राजनैतिक दल इस शर्मनाक घटना को भले ही किसी भी तरह पेश करें लेकिन बड़ी सच्चाई यही है कि एक विशेष राजनैतिक दल के लोगों ने बाबरी मस्जिद को ढहाकर अपनी भविष्य की राजनीति का बीज बोया था।

बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना के 25 वर्ष बाद भी इस मामले में लोगों को सजा दिलाये जाने से अधिक इस बात का समाधान करने की कोशिशें की जा रही हैं कि वहां मंदिर बनेगा या मस्जिद। बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना की जांच के लिए बने लिब्राहन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ तौर पर लिखा है कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस गहरी साज़िश थी जिसमें आरएसएसएस-बीजेपी से जुड़े कई शीर्ष नेता शामिल थे।

वहीँ इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए जस्टिस लिब्राहन ने कहा था कि पहले बाबरी मस्जिद विध्वंश में शामिल लोगों पर केस चलाया जाए। इस मामले के निपटारे के बाद ही ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर सुनवाई शुरू हो। उनका साफतौर पर कहना था कि बाबरी मस्जिद विध्वंश में आरोपी लोगों पर कार्रवाही से पहले मालिकाना हक पर सुनवाई करने से वह केस प्रभावित हो सकता है।

बीते 25 वर्षो में बाबरी मस्जिद विध्वंश के आरोपियों को सजा नहीं मिल सकी है। इसे कानूनी प्रक्रिया की धीमी चाल कहकर नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। 6 मार्च 2017 में सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई से कहा है कि सभी 13 आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश की पूरक चार्जशीट दाखिल की जाए।

बता दें कि बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़े दो मामले चल रहे हैं। इनमे लखनऊ का मामला बाबरी मस्जिद के ढांचा गिराए जाने से जुड़ा है। वहीं रायबरेली में भीड़ को उकसाने का केस दर्ज हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दोनों मामलों की सुनवाई एक ही स्थान पर होना चाहिए।

वहीँ 6 अप्रेल को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी समेत अन्य आरोपियों पर केस चलता रहेगा। सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा कि केस लखनऊ में चल सकता है, लेकिन दो साल में सुनवाई पूरी हो जाए।

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उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ के कुर्सी संभालने के बाद बाबरी मस्जिद विध्वंश में शामिल आरोपियों के मामले की सुनवाई में तेजी लाने की जगह ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर नई पहला शुरू की गयी।

सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में साफ़ तौर पर कहा कि ये मामले अदालतों से बाहर निपटाए जाने चाहिए। ये भावनाओं और धर्म के मसले हैं. अदालत को बीच में तभी पड़ना चाहिए जब आप इसे सुलझा न सकें।

हिन्दू संगठनों से जुड़े कुछ नेताओं ने दावा किया कि यह मामला कोर्ट के बाहर आपसी सहमति से निपट सकता है लेकिन इस मामले में सुलह के लिए आगे आये लोगों के लिए आपसी सहमति का मतलब मुसलमानो से ज़मीन के मालिकाना हक़ से दावा वापस लेना था। इसलिए कोर्ट के बाहर सुलह की ये कोशिश शुरू होने से पहले ही विवादित हो गयी।

हिन्दू संगठनों से जुड़े लोग आपसी सहमति का मतलब मानते हैं कि मुसलमान विवादित ज़मीन से अपना दावा वापस ले लें और मस्जिद कहीं और बना लें। जिसे सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड किसी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं।

अब इस मामले को हल करने के लिए सुप्रीमकोर्ट में नियमति सुनवाई होनी है लेकिन यदि ज़मीन के मालिकाना हक के लिए नियमित सुनवाई हो सकती है तो बाबरी विध्वंश के आरोपियों के केस की सुनवाई नियमित तौर पर क्यों नहीं हो सकती।

6 दिसंबर 1992 को हुई घटना ने देश के दो समुदायों के बीच एक खाई पैदा पर दी लेकिन उस खाई को राजनैतिक दलों द्वारा लगातार कुरेदे जाने से यह खाई और गहरी हो चली है जिसे जल्द भरना मुमकिन नहीं होगा। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि बाबरी विध्वंश की घटना से बीजेपी को उम्मीद से कई गुना राजनैतिक लाभ मिला है।

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