2019 लोकसभा चुनाव: कहीं नीतीश को न ले डूबे बीजेपी

नई दिल्ली(राजाज़ैद)। देश में अबतक हुए लोकसभा चुनाव में बिहार की स्थति हर बार बदलती रही है। बिहार के मतदाताओं ने हर बार उगते सूरज को सलाम किया है।

2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के कारण बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने कुल मिलाकर 40 में से 31 सीटें जीती थीं। इसमें बीजेपी ने 22 सीटें जीती थीं जबकि इससे पहले 2009 में बीजेपी ने 12 सीटें जीती थीं।

पिछले लोकसभा चुनाव में 22 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी इस बार 17 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। जेडीयू और लोकजनशक्ति पार्टी के साथ हुए गठबंधन के तहत बीजेपी और जेडीयू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे वहीँ लोकजनशक्ति पार्टी 6 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

पिछले चुनाव में 22 सीटें जीतने वाली बीजेपी का 2019 में 17 सीटों पर चुनाव लड़ने का सीधा मतलब है कि चुनाव से पहले ही उसे 5 सीटों का नुकसान हो गया है। ऐसे में जिन पांच सीटों का बीजेपी को त्याग करना पड़ा है उन सीटों पर पिछले चुनाव में जीतकर आये बीजेपी सांसदों का टिकिट काटना तय है।

बिहार के कुछ शहरी इलाको को छोड़ दिया जाए तो देहात से जुडी अधिकांश सीटों पर मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग से जुटे मतदाता निर्णायक साबित हुए हैं। लालू यादव चुनाव नहीं लड़ सकते लेकिन परदे के पीछे से राजनीति अवश्य करेंगे।

बिहार में अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की संख्या 47% है। इनमे 14% यादव मतदाता और 7% कुशवाहा मतदाता भी शामिल हैं। वहीँ मुस्लिम मतदाताओं की तादाद करीब 16.9% और दलित मतदाताओं की तादाद 20% बताई जाती है। अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं को मिलकर करीब 63.9% हो जाती है।

वहीँ सबसे अहम बात यह भी है कि इस बार माहौल 2014 से अलग है। राज्य में नीतीश कुमार की सरकार है, ज़ाहिर है कुछ फीसदी एंटीइंकम्बेंसी का असर भी होगा। ऐसे हालातो में हवा का रुख कब बदल जाए, ये कोई नहीं कह सकता।

नीतीश कुमार को जिस सुशासन के लिए जाना जाता था वह बीजेपी के साथ राज्य में सरकार बनाने के बाद से फीका पड़ चूका है। राज्य में अपराध बढे हैं यहाँ तक कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा अपराधों में भी बढ़ोत्तरी हुई है। साथ ही बीजेपी के बड़बोले नेताओं के बयान से अल्पसंख्यको का वो तबका जो कभी नीतीश कुमार के साथ था अब दुरी बना चूका है। ऐसे में स्वाभाविक है कि जिस करिश्मे की उम्मीद बीजेपी और जेडीयू लगाए बैठे हैं वह किसी तरह मुमकिन नहीं हैं।

बिहार का मतदाता बेहद सूझबूझ वाला मतदाता माना जाता है। यही कारण है कि बिहार के मतदाताओं ने हमेशा उभरते नेता को आगे बढ़ाया है। फिर चाहे वे नतीश कुमार ही क्यों न हों।

बिहार में बीजेपी की मुश्किलें यहीं समाप्त नहीं होतीं। बिहार से दो बीजेपी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आज़ाद पार्टी छोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। शत्रुघ्न सिन्हा पटना से और कीर्ति आज़ाद दरभंगा से सांसद हैं। कीर्ति आज़ाद बीजेपी से निलंबित चल रहे हैं वहीँ शत्रुघ्न सिन्हा पार्टी के अंदर होने के बावजूद पार्टी नेतृत्व को भाव नहीं देते बल्कि मौके मौके पर सरकार और पार्टी पर निशाने साधते हैं।

जैसा कि तय लग रहा है यदि शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आज़ाद ने चुनाव से पहले बीजेपी छोड़कर किसी अन्य पार्टी का दामन थामा तो चुनाव में बीजेपी के लिए मुश्किलें पैदा होना तय है। शत्रुघ्न सिन्हा ऐसी शख्सियत हैं जो भीड़ जुटाने और अपनी बातो को जनता के दिलो तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं।

जानकारों की माने तो यदि 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को भारी नुकसान होता है तो उसके लिए जेडीयू से अधिक ज़िम्मेदार बीजेपी होगी। बिहार में बीजेपी के साथ सरकार बनाने का असर नीतीश कुमार को लोकसभा चुनावो में देखने को मिल सकता है।

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