2019 चुनाव: महागठबंधन बना तो यूपी में 60 सीटों पर हार रही बीजेपी

नई दिल्ली। वर्ष 2019 के आम चुनाव में यदि विपक्ष ने मिलकर चुनाव लड़ा तो केवल उत्तर प्रदेश में सिर्फ 20 सीटें ही ऐसी हैं जहाँ बीजेपी अपनी जीत की संभावनाएं खोज सकती है।

चुनाव विशेषज्ञों की राय में यदि महागठबंधन बना तो कई राज्यों में बीजेपी को मुकाबले में बने रहने के लिए मशक्क्त करनी पड़ेगी वहीँ उत्तर प्रदेश में करीब 60 सीटें ऐसी हैं जिसपर जातीय समीकरण बीजेपी के पक्ष में फिट नहीं बैठते।

विशेषज्ञों की राय में बीजेपी ने 2014 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीती थीं। इसका बड़ा कारण मोदी लहर नहीं सपा बसपा और कांग्रेस का अलग अलग चुनाव लड़ना था। जानकारों के अनुसार यदि 2014 में भी महागठबंधन के बैनर तले विपक्ष ने मिलकर चुनाव लड़ा होता तो बीजेपी मुश्किल से 25 सीटें ही जीत पाती।

विशेषज्ञों का कहना है कि सेकुलर मतो का विभाजन और जातिगत मतदाताओं का बंटना बीजेपी को फायदा पहुँचता रहा है लेकिन यदि महागठबंधन बनता है तो न सिर्फ सेकुलर मतो का विभाजन रुकेगा बल्कि जातिगत मतदाताओं को एकजुट करने में मदद करेगा।

जानकारों की माने तो महागठबंधन बना तो वाराणसी में भी बीजेपी को घुटने टेकने पड़ सकते हैं। 2014 के आम चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार पीएम नरेंद्र मोदी को 56.37%, आप उम्मीदवार अरविन्द केजरीवाल को 20.30%, कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय 7.34%, बसपा उम्मीदवार वेद प्रकाश जैसवाल को 5.88% तथा सपा के कैलाश चौरसिया को 4.39% वोट मिले थे।

हालाँकि इस चुनाव में सर्वाधिक वोट बीजेपी को मिले थे लेकिन इसके पीछे एक अहम वजह विपक्ष का अलग अलग और आपस में टकराव बड़ा कारण था। विपक्ष के एकजुट न होने के कारण जातिगत मतदाताओं में बड़ा बंटवारा देखने को मिला था जिसका फायदा बीजेपी ने उठाया।

जानकारों के अनुसार उत्तर प्रदेश की 60 सीटें ऐसी हैं जहाँ विपक्ष के एकजुट होने से बीजेपी को बड़ा नुकसान होने की सम्भावना है। यदि 2014 में पूरे उत्तर प्रदेश में बीजेपी को मिले मतों का आंकलन किया जाए तो बीजेपी को कुल 42.30%, समाजवादी पार्टी को 22.20%, बसपा को 19.60% तथा कांग्रेस को 7.50% और अपना दल को 1% वोट मिले थे।

यदि 2014 के चुनाव परिणाम को 2019 में महागठबंधन की दृष्टि से आँका जाए तो सपा,बसपा और कांग्रेस को मिले मतों का प्रतिशत जोड़ा जाए तो 49.30% होता है जो बीजेपी से कहीं ज़्यादा है। सबसे अहम बात यह भी है कि मोदी सरकार को लेकर जनता में उत्साह की कमी आयी है और अब जनता मोदी सरकार का काम काज देख चुकी है। ऐसे में बीजेपी के वोट में कमी आना स्वाभाविक है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश में गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा सीट पर बीजेपी की पराजय का मूल कारण विपक्ष के परम्परागत मतों का बंटवारा न होना है। यदि कैराना, फूलपुर और गोरखपुर में भी विपक्ष ने अलग अलग चुनाव लड़ा होता तो तीनो सीटें फिर से बीजेपी के खाते में चलती जातीं।

जानकारों की माने तो 2019 में एकजुट विपक्ष के चुनाव लड़ने की स्थति में बीजेपी को बागपत, मेरठ, मुज़फ्फरनगर, सहारनपुर, गाज़ियाबाद, अलीगढ, मथुरा, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहाँपुर, उन्नाव, बाराबंकी, कानपूर, इलाहाबाद, हमीरपुर, गोरखपुर, बदायूं, एटा, सीतापुर, हरदोई, इटावा, फैज़ाबाद, आंबेडकरनगर, मिर्ज़ापुर और संत कबीर नगर जिले की जिन 60 सीटों पर हार झेलनी पड़ सकती है।

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