2014 के मुकाबले बीजेपी की चाल धीमी, प्रतिदिन बढ़ता जा रहा फासला

नई दिल्ली(राजाज़ैद)। 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी जिस गति के साथ चुनाव प्रचार में उतरी थी वह गति 2019 के चुनावो में दिखाई नहीं दे रही है। खासकर उत्तर भारत के इलाको में बीजेपी के प्रचार अभियान में वह धार नहीं है जो 2014 के आम चुनाव में देखने को मिली थी।

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सर्वाधिक सीटें देने वाले उत्तर प्रदेश में इस बार सपा बसपा गठबंधन ने बीजेपी की गति पर ब्रेक लगा दिए हैं। वहीँ प्रियंका गांधी के राजनीति में आने के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाको में कांग्रेस के एक बार फिर उठ खड़े होने से बीजेपी के समीकरणों पर पानी फिरता नज़र आ रहा है।

उत्तर प्रदेश को लेकर एक अहम बात यह भी है कि कांग्रेस ने इस बार इस तरह टिकिट बांटे हैं कि प्रमुख सीटों पर वह सेकुलर वोटों का विभाजन नहीं होने दे रही इससे बीजेपी को मिलने वाले फायदे पर ब्रेक लगे हैं।

मेरठ लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने वैश्य समुदाय के प्रत्याशी को उम्मीदवार बनाकर यह साबित कर दिया कि उसका उम्मीदवार कहीं न कहीं बीजेपी को ही नुकसान पहुंचाएगा। वहीँ गौतम बुद्ध नगर सीट पर भी कांग्रेस ने ठाकुर समुदाय से अरविन्द कुमार सिंह को मैदान में उतार कर बीजेपी के उस वोट बैंक में सेंधमारी की है जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा को जिताकर संसद भेजा था।

उत्तर प्रदेश में पहले चरण के चुनाव में जिन आठ सीटों पर चुनाव होना है उनमे से अधिकांश सीटों पर बीजेपी की हालत 2014 के मुकाबले कमज़ोर दिखाई दे रही है। जानकारों की माने तो इन आठ सीटों में बीजेपी को एक सीट ही मिलने की सम्भावना है जबकि 2014 के चुनाव में बीजेपी ने सभी आठ सीटें जीती थीं।

बीजेपी की धीमी चाल की ऐसी ही स्थति मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी है। इन तीनो राज्यों में भी 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस बार बड़ा अंतर् देखने को मिल रहा है। अहम कारण तीनो राज्यों से बीजेपी की सत्ता से विदाई तथा बीजेपी की आंतरिक गुटबंदी है।

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मध्य प्रदेश की 29 सीटों में से 27 सीटें जीती थीं, वहीँ छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में से 10 सीटें और राजस्थान की सभी 25 सीटें जीती थीं। लेकिन इस बार हालात पहले के मुकाबले काफी बदले हुए हैं। तीनो राज्यों में कांग्रेस के सत्ता पर काबिज होने के बाद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस का वोट बैंक बढ़ा है। ऐसे हालातो में बीजेपी के लिए 2014 वाला प्रदर्शन दोहरा पाना नामुमकिन है।

दक्षिण में बीजेपी को किसी बड़े करिश्मे की उम्मीद नहीं हैं वहीँ पूर्वोत्तर के राज्यो में बीजेपी का विरोध बढ़ता जा रहा है। असम में एनआरसी के मुद्दे पर राज्य की बीजेपी की सरकार का विरोध हो रहा है तो त्रिपुरा में मुख्यमंत्री और पार्टी के बीच पैदा हुई खाई और गहरी होती जा रही है।

जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है वहीँ भी पार्टी पूरी लय में नहीं दिखाई दे रही। हिमाचल में ब्राह्मण चेहरा सुखराम और उनके पोते के कांग्रेस में आने से बीजेपी को दो सीटों का सीधा नुकसान होता दिख रहा है। वहीँ उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी द्वारा कांग्रेस ज्वाइन करने से बीजेपी को बड़ा झटका लगा है।

कांग्रेस का बढ़ रहा ग्राफ:

लोकसभा चुनाव के प्रचार में कांग्रेस जिस तरह आक्रामक रुख अपना रही है उससे कहीं न कहीं कांग्रेस का ग्राफ बढ़ा रहा है। ज़मीनी हकीकत देखें तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने भाषणों से फिलहाल यह साबित करने में कामयाब होते दिख रहे हैं कि मोदी सरकार रोज़गार के मामले में फ्लॉप साबित हुई है तथा राफेल डील में पीएम नरेंद्र मोदी की नाक के नीचे बड़ा गोलमाल हुआ है।

बीजेपी की सत्ता से बढ़ रही दूरी :

2019 में सत्ता में वापसी को लेकर बीजेपी दावे ज़रूर कर रही है लेकिन ज़मीनी हकीकत बीजेपी के दावों से मेल नहीं खा रही। बीजेपी भले ही आंकड़ों की बाज़ीगरी में माहिर हो लेकिन उसके सामने बड़ी चुनौती भीड़ को वोटों में बदलने की है। हाल ही में मेरठ में आयोजित पीएम नरेंद्र मोदी की रैली और आगरा में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रैली से भीड़ गायब होना बीजेपी के लिए किसी बड़े सन्देश से कम नहीं हैं।

2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान पार्टी नेताओं की रैली में जिस तरह ताबड़तोड़ भीड़ जुटती थी वह 2019 में दिखाई नहीं दे रही। ये इस बात के संकेत हैं कि चुनाव जैसे जैसे नज़दीक आ रहे हैं वैसे वैसे सत्ता बीजेपी से दूरी बनाती जा रही है।

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