सुप्रीमकोर्ट ने इच्छा मृत्यु की वसीयत को दी मान्यता, पढ़िए- क्या है इच्छा मृत्यु

नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत उच्चतम न्यायालय ने इस तथ्य को मान्यता दे दी है कि असाध्य रोग से ग्रस्त मरीज इच्छा-पत्र (वसीयत) लिख सकता है। संविधान पीठ ने गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया।

इस याचिका में अनुरोध किया गया था कि असाध्य रोगों से ग्रस्त मरीजों को शारीरिक कष्टों से मुक्ति दिलाने और मृत्यु का वरण करने के लिए जीवन रक्षक उपकरणों को हटाने की अनुमति प्रदान की जाए।

केंद्र सरकार ने 15 जनवरी, 2016 को अदालत को सूचित किया था कि विधि आयोग ने अपनी 241वीं रिपोर्ट में चुनिंदा सुरक्षा उपायों के साथ निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु की अनुमति देने की सिफारिश की थी।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा है कि निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु और अग्रिम इच्छा पत्र लिखने की अनुमति है। संविधान पीठ ने कहा कि इस मामले में कानून बनने तक फैसले में प्रतिपादित दिशा-निर्देश प्रभावी रहेंगे। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एके सीकरी, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा कि असाध्य बीमारी से ग्रस्त मरीजों के मामले में ऐसे मरीज के नजदीकी मित्र और रिश्तेदार इस तरह अग्रिम निर्देश दे सकते हैं और इच्छा-पत्र का निष्पादन कर सकते हैं। इसके बाद मेडिकल बोर्ड ऐसे इच्छा-पत्र पर विचार करेगा।

प्रधान न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हालांकि संविधान पीठ की चार और अलग-अलग राय हैं, परंतु सभी जज इस बात पर एकमत हैं कि चूंकि एक मरीज में जीने की इच्छा नहीं होने पर उसे निष्क्रिय अवस्था की पीड़ा सहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, इसलिए ऐसे इच्छा-पत्र (वसीयत) को मान्यता दी जानी चाहिए।

क्या है इच्छा मृत्यु :

इच्छा मृत्य का भावात्मक अर्थ अपनी मर्जी से मौत को चुनना माना जाता है। इच्छा मृत्यु को लेकर सुप्रीमकोर्ट में एक गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की जनहित याचिका दायर की थी।

याचिका में अनुरोध किया गया था कि असाध्य रोगों से ग्रस्त मरीजों को शारीरिक कष्टों से मुक्ति दिलाने और मृत्यु का वरण करने के लिए जीवन रक्षक उपकरणों को हटाने की अनुमति प्रदान की जाए।

सुप्रीमकोर्ट की मुहर के बाद असाध्य बीमारी से ग्रस्त मरीजों के मामले में ऐसे मरीज के नजदीकी मित्र और रिश्तेदार इस तरह अग्रिम निर्देश दे सकते हैं और इच्छा-पत्र का निष्पादन कर सकते हैं।

अरुणा शानबाग की वो दास्तां जिसने उसे इच्छा मृत्यु मांगने को मजबूर किया :

अरुणा शानबाग उस महिला का नाम है जो ज़िन्दगी और मौत से 42 साल तक जूझती रही। अरुणा जब 23 साल की थी तब उसके साथ एक गंभीर हादसा हुआ। अरुणा केईएम अस्पताल में बतौर नर्स काम करती थी।

अस्पताल के अस्पताल की डॉग रिसर्च लेबोरेटरी में सोहनलाल काम करता था, उसे कुत्तों के लिए आने वाला मांस खाने की आदत थी। अरुणा अक्सर सोहनलाल को इस काम से रोकने की कोशिश करती थी। इसके लिए अरुणा ने कई बार सोहन लाल को डांटा भी था । अरुणा की इस फटकार पर सोहनलाल मन ही मन अरुणा शानबाग से दुश्मनी मानने लगा और वह उस पर बुरी नज़र रखने लगा।

एक दिन जब अरुणा अपनी डयूटी खत्म कर कपड़े बदलने के लिए चेंजिंग रूम में पहुंची तो सोहन वहां पहले से ही घात लगाकर बैठा था, उसने अरुणा को दबोच लिया, कुत्ते के गले की चेन ही करुणा के गले पर कस दी। इसके बाद अरुणा का यौन शोषण करने की कोशिश की। चेन के कसाब से अरुणा के दिमाग तक खून पहुंचाने वाली नसें फट गईं। उसकी आंखों की रोशनी चली गई, शरीर को लकवा मार गया। इस घटना के बाद अरुणा कौमा में चली गयी ।

अरुणा के कौमा में जाने के बाद उसकी देखरेख करने वाले रिश्तेदारों और सगे संबंधियों ने एक एक कर उसका साथ छोड़ दिया। अंत में बेसुध अरुणा अकेली रह गयी। उसके इलाज के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। उसकी बीमारी भी असाध्य हो चुकी थी।

अरुणा का हाल देखकर, उस पर किताब लिखने वाली पिंकी विरानी ने अरुणा के लिए सुप्रीमकोर्ट में अर्जी देकर इच्छा मृत्यु की मांग की थी जिसे सुप्रीमकोर्ट ने ठुकरा दिया था।

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