सीताराम केसरी: PM मोदी द्वारा कही गयी बात में निकला ये झोल, पढ़िए क्या है सच्चाई !

नई दिल्ली। चुनावी सभाओं में राजनैतिक दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप अवश्य करते हैं लेकिन जब इतिहास को बदलकर पेश किया जाए तो सवाल उठना लाजमी है।

यह पहला मौका नहीं था जब पीएम नरेंद्र मोदी ने किसी मंच से इतिहास को पलटकर पेश किया हो, इससे पहले भी वे कई भाषणों में इतिहास से परे बातें कह चुके हैं। हालाँकि मामला सिर्फ इतिहास तक ही सीमित नहीं है कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाने में भी गलत आंकड़े पेश कर चुके हैं।

इस बार पीएम नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर हमला बोलने की जल्दबाज़ी में कुछ ऐसा कह दिया जो था ही नहीं। उन्होंने अपने सम्बोधन में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी को दलित बताया जबकि ये सच नहीं है।

सीताराम केसरी बिहार के दानापुर के रहने वाले थे और पिछड़े समाज से अवश्य थे लेकिन वे बनिया समुदाय से थे। पीएम मोदी ने छिंदवाड़ा की चुनावी सभा में कहा कि ‘देश को पता है कि सीताराम केसरी दलित, पीड़ित और शोषित समाज से आये हुए व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष पद से कैसे हटाया गया।’

पीएम मोदी यहीं नही रुके। उन्होंने सीताराम केसरी के बारे में आगे कहा कि ‘कैसे उन्हें बाथरूम में बंद कर दिया गया, कैसे निकालकर फुटपाथ पर फेंक दिया गया था और इसके बाद मैडम सोनिया जी को अध्यक्ष बना दिया गया था।’

उन्होंने कहा कि ‘ये इतिहास हिंदुस्तान भलीभांति जानता है कि दलित हो, पिछड़ा हो, वंचित हो, अगर वो कांग्रेस अध्यक्ष बन भी गया तो उसको भी दो साल नहीं झेल पाए।’

क्या है सच्चाई:

सीताराम केसरी राजनीति का वह नाम है जो स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ा था। केसरी को 1930-1942 के बीच कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा। वे 1980 में कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष ननाये गए थे। वे 6 बार सांसद बने, जिनमे से एक बार लोकसभा के लिए और पांच बार राज्यसभा के लिए चुने गए। वे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पी॰ वी॰ नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री कार्यकाल में केन्द्रीय मंत्री रहे।

जब 1992 में नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री थे तब बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद देश के अल्पसंख्यको ने क्षेत्रीय दलों में विश्वास तलाशना शुरू कर दिया था। 1992 से 1995 के बीच पहुँचते पहुँचते कांग्रेस धराशाही हो चुकी थी। पार्टी के दो कद्दावर नेताओं अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी ने इस्तीफा दे दिया था और ऐसा लगता था कि कांग्रेस का उभर पाना अब मुश्किल होगा।

1996 में जब कांग्रेस पूरी तरह धराशाही हो चुकी थी तब पार्टी को एकजुट रखने के उद्देश्य से सीताराम केसरी को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। भले ही उस समय गांधी परिवार का कोई सदस्य राजनीति में नहीं था लेकिन यह कहना गलत होगा कि गांधी परिवार को पार्टी की कोई जानकारी नहीं रहती थी।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद गांधी परिवार बेहद सहमा हुआ था और इस परिवार के लिए जल्दी ही सदमे से बाहर आना बहुत आसान नहीं था। जब सीताराम केसरी अध्यक्ष बने तब भी उनका यही कहना था कि वे कांग्रेस के कर्मठ सिपाही है और गांधी परिवार के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता।

इधर कमज़ोर हो रही कांग्रेस को एकजुट करने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का विचार था कि यदि कांग्रेस को पुराने स्वरुप में वापस लाना है तो इसमें गांधी नेहरू परिवार की भूमिका सुनिश्चित की जानी चाहिए। उस समय न तो सीताराम केसरी का ऐसा कद था कि वे अपने करिश्मे के सहारे कांग्रेस को एकजुट रख सकें और न ही नरसिम्हाराव का।

ऐसे हालातो में गांधी परिवार के वफादारों के प्रयास जारी रहे और अंततः सोनिया गांधी ने 1997 में राजनीति में आने की हामी भर दी। वर्ष 1997 में कोलकाता के प्लेनरी सेशन में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की और वर्ष 1998 में वो कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयीं।

  • सीताराम केसरी पर पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए कोई दबाव दिया गया इसका कहीं उल्लेख नहीं है।
  • सीताराम केसरी को बाथरूम में बंद करने वाली जिस घटना का पीएम मोदी ने अपने भाषण में ज़िक्र किया उसके बारे में भी कोई तथ्य अभी तक सामने नहीं आया। अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद स्वयं सीताराम केसरी ने  भी इसका कहीं उल्लेख नहीं किया।
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