सिब्बल ने महाभियोग पर जजों की पीठ बनाने पर उठाये सवाल, पूछा ‘किसने दिया था आदेश’

नई दिल्ली। कांग्रेस के दो सांसदों ने राज्यसभा सभापति द्वारा महाभियोग खारिज करने पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसे अब वापस ले लिया गया है। इस दौरान वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने इस मामले में पांच जजों की संवैधानिक पीठ के गठन पर कई सवाल उठाए।

कपिल सिब्बल ने इस मामले में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा है कि उन्हें इस बात को जानने का अधिकार है कि ये पांच जजों की बेंच किसने बनाई। इसकी डिटेल साइट पर नहीं हैं, ना ही हमें ये पता है कि ऑर्डर किसने पास किया है।

उन्होंने पूछा यह फैसला चीफ जस्टिस ने किया या किसी और ने किया। उन्हें फैसले की कॉपी मिलनी चाहिए क्योंकि ये उनका अधिकार है। कोर्ट ने उन्हें कहा है कि मेरिट पर बहस करें, लेकिन मेरिट पर बहस तभी होगी जब हमें ऑर्डर की कॉपी मिलेगी।

सिब्बल ने बताया कि उन्होंने कोर्ट के समक्ष ये सात सवाल रखे हैं-

-ऑर्टिकल 145 (3) कोर्ट आदेश के जरिए पांच जजों की बेंच बनाने की अनुमति देता है।

-इस पीठ का गठन न्यायिक आदेश के बाद ही हो सकता है।

-इस केस में कोई न्यायिक आदेश नहीं है।

-ये स्वत: संज्ञान का मामला है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं को इसकी कोई जानकारी नहीं थी।

-अगर सीजेआई ही अथॉरिटी हैं, तो याचिकाकर्ताओं को ये बताया जाना चाहिए।

-अगर सीजेआई ने आदेश पास किया है, तो याचिकाकर्ताओं को बताया जाना चाहिए।

-इस मामले में याचिकाकर्ता के पास आदेश को चुनौती देने का अधिकार है।

हम सियासत नहीं कर रहे हैं :

सिब्बल ने कहा कि यह पूरा मामला कोर्ट का है। इसमें जरा भी राजनीति नहीं की जा रही है। हमारे द्वारा पूछे गए सवाल भी किसी राजनीति से जुड़े हुए नहीं हैं। हालांकि सरकार आरोप लगा रही है कि कांग्रेस पार्टी इस पर राजनीति कर रही है लेकिन सिब्बल का कहना है कि कांग्रेस या उनका इसमें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है। वे न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए संकल्पित हैं।

इसलिए याचिका वापस ली :

न्यायमूर्ति एके सीकरी की अध्यक्षता में पांच जजों की बेंच की स्थापना के संबंध में उनके सबमिशन को स्वीकार करने के लिए कोर्ट अनिच्छुक था।

कपिल सिब्बल ने संवैधानिक पीठ के गठन से जुड़े प्रशासनिक ऑर्डर की कॉपी दिखाने की मांग की। इस पर, अटॉर्नी जनरल ने कहा कि पीठ याचिकाकर्ता को प्रशासनिक ऑर्डर की कॉपी नहीं दिखा सकती। जब खंडपीठ ने उनके तर्क और सबमिशन को स्वीकार करने की अनिच्छा दिखाई, तो सिब्बल ने याचिका वापस लेने का फैसला किया।

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