बड़ी खबर

समय से पहले क्यों आम चुनाव चाहती है बीजेपी, क्या ख़त्म हो रहा पीएम मोदी का जादू ?

नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार का कार्यकाल वर्ष 2019 में पूरा होगा लेकिन ऐसी अटकलें लगायी जाने लगी हैं कि बीजेपी वर्ष 2018 में लोकसभा चुनाव करना चाहती है। हालाँकि समय से पहले लोकसभा चुनाव कराये जाने के सरकार के इरादे के पीछे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि वह राजस्थान, प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावो के साथ ही आम चुनावो में उतरना चाहती है लेकिन चुनाव विशेषज्ञ इसके पीछे अन्य कारण बता रहे हैं।

मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम की विधानसभाओं का कार्यकाल नवंबर-दिसंबर 2018 में समाप्त हो रहा है। इसके अलावा तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में भी विधानसभा चुनाव इन प्रस्तावित चुनावों के साथ करवाए जा सकते हैं। इन राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल अप्रैल 2019 तक है।

वहीँ चुनाव विशेषज्ञों का कहना है कि बीजेपी समय से पहले नहीं बल्कि पीएम मोदी का जादू कम या खत्म होने से पहले लोकसभा चुनाव करना चाहती है। जानकारों का कहना है कि मोदी सरकार को केंद्र में तीन वर्ष से अधिक समय हो चुका है, इस दौरान कई ऐसे मुद्दे उभर कर सामने आये हैं जिनका जबाव खुद बीजेपी के पास नहीं है।

हालाँकि भाजपा संगठन चिंता की इन लकीरों छिपाने की कोशिश जरूर कर रहा है लेकिन यह बड़ी सच्चाई है कि नोटबंदी जैसे बड़े मामलो में सरकार की किरकिरी होने के बाद वह आम चुनाव में इस मुद्दे पर अपनी पीठ नहीं थपथपा पाएगी।

जानकारों के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता से जो वादे किये गए थे उन पर मोदी सरकार का पूर्णतः खरा न उतर पाना पार्टी के लिए बड़ी चिंता का विषय है। वहीँ जानकारों का यह भी कहना है कि जितने अधिक समय तक केंद्र में बीजेपी सत्ता में रहेगी उतने ही मुद्दे और भी बढ़ जायेंगे। यही सबसे बड़ा कारण है कि बीजेपी समय से पहले लोकसभा चुनाव कराने की कोशिश कर रही है।

वहीँ अगले वर्ष मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। ऐसे में बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि इन राज्यों के विधानसभा चुनावो के साथ ही आम चुनाव करा दिए जाये और जनता को ये सन्देश दिया जाए कि देश पर चुनाव के अतिरिक्त खर्च के भार को कम करने के लिए विधानसभा चुनावो के साथ ही लोकसभा चुनाव कराये जा रहे हैं।

बीजेपी जानती है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजरात में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में उसे सत्ता-विरोध माहौल का सामना करना होगा। ऐसे में अगर पूर्व के चुनावों के मुकाबले पार्टी की सीटों में कमी आती है तो इसका सीधा असर 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा।वहीँ अगर कर्नाटक में कांग्रेस और त्रिपुरा में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) जीत जाती है तो बीजेपी के लिए यह मनोबल गिराने वाला साबित होगा।

बीजेपी को यह भी याद रखना होगा कि जनता अक्सर सत्तारूढ़ दल के प्रदर्शन से असंतुष्ट होकर उनके खिलाफ मतदान करती रही है, चाहे विपक्ष भले कमजोर हो. इस साल हुए गोवा और मणिपुर विधानसभा के चुनाव में ऐसा देखने को मिला, जहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

यह अलग बात है कि विधायकों को अपने पाले में शामिल करने में सफल रही बीजेपी ने गोवा और मणिपुर में सरकार बनाई. लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि बीजेपी के प्रति असंतोष की भावना है।

हाल के दिनों में इस तरह का असंतोष एक बड़े समुदाय के बीच भी देखने को मिला, जब कुछ रिटायर्ड नौकरशाहों और सेना के रिटायर्ड अधिकारियों ने प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया और वैज्ञानिकों ने सत्ता समर्थकों द्वारा विघ्नकारी कार्यो को बढ़ावा दिए जाने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

इसके अलावा बीजेपी सरकार के सामने बेरोजगारी और किसानों की समस्या के रूप में दो सबसे बड़ी चुनौतियां भी हैं. देश में बढ़ रहे असहिष्णुता के माहौल को देखते हुए भी आम जनमानस सशंकित है।

गोरक्षा के नाम पर लोगों के साथ हो रहे अत्याचार, पुलिस द्वारा घर में घुसकर यह देखना कि गाय का मांस तो नहीं खाया जा रहा, जैसा कि महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार चाहती है लेकिन ऐसी घटनाओं से मोदी सरकार की छवि को न सिर्फ नुकसान पहुंचा है बल्कि ऐसी कुछ घटनाओं के चलते बीफ खाने वाले गैर मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं ने बीजेपी से दूरी ज़रूर बना ली है।

देश में राष्ट्रवाद और कथित राष्ट्रवाद को लेकर एक बड़ा गैप पैदा हो गया है। न्यूज चैनलों के बीच अंधराष्ट्रवाद को लेकर मचा घमासान, पार्टी समर्थकों द्वारा सोशल नेटवर्क पर विरोधियों के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल और इतिहास के साथ छेड़छाड़ कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर बीजेपी बैकफुट पर नजर आती है।

इन सबका अगले एक-दो साल में क्या मिला-जुला असर होगा, कोई नहीं जान सकता लेकिन देश की अर्थव्यवस्था की धीमी गति भी केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए गंभीर चुनौती होगी।

2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी जिस चमक के साथ सत्ता में आई वह ज्यादा मद्धिम तो नहीं पड़ी है, लेकिन समय से पहले चुनाव के विकल्प पर विचार करते हुए भी बीजेपी को नरेंद्र मोदी में जनता द्वारा व्यक्त किए गए विश्वास पर ही निर्भर रहना होगा।

आत्मघाती भी हो सकता है फैसला:

बीजेपी के रणनीतिकार यह भी जानते हैं कि समय से पहले लोकसभा चुनाव कराया जाना सत्ता में वापसी की कोई गारंटी नहीं हैं। यही बड़ा कारण भी है कि बीजेपी पूरी कोशिश के साथ एनडीए के घटक दलों की तादाद बढ़ाने में जुटी है। अगर तमाम राजनीतिक दल प्रधानमंत्री और चुनाव आयोग की अपील मान लेते हैं और समयपूर्व लोकसभा चुनाव पर एकमत हो जाते हैं तो कई राज्यों में एक साथ सरकार बदल सकती है।

इतना ही नहीं राज्य सरकारों के कामकाज का असर भी इन चुनावो में बीजेपी को प्रभावित करेगा। खासकर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार है। वर्ष 2014 में इन तीन राज्यों से बीजेपी ने अच्छी तादाद में लोकसभा सीटें जीती थीं। यदि इन राज्यों की सरकारों के खिलाफ मतदाताओं का मिजाज बना तो बीजेपी को निश्चित तौर पर लोकसभा सीटें भी गंवानी पड़ सकती हैं।

Get Live News Updates Download Free Android App, Like our Page on Facebook, Follow us on Twitter and Google

Facebook

Copyright © 2017 Live Media Network

To Top