सत्ता से बाहर हुई बीजेपी तो क्या करेंगे नरेंद्र मोदी (पार्ट 2)

नई दिल्ली (राजा ज़ैद)। लोकसभा चुनाव के लिए चार चरण का मतदान का काम संपन्न हो चूका है। पांचवे चरण में कल (06 मई) 07 राज्यों की 51 सीटों पर मतदान होगा। पांचवे चरण के चुनाव के साथ ही देश की 425 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव का काम पूरा हो जायेगा और छटवे और सातवें चरण में 59-59 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव का काम शेष रह जायेगा।

बीजेपी और विपक्ष की तरफ से लगातार अपनी अपनी जीत को लेकर दावे किये जा रहे हैं। चुनावी नतीजे 23 मई को आएंगे। इसके बावजूद कयासों और माथापच्ची का दौर जारी है।

नतीजे आने के बाद पता चलेगा कि देश में अगली सरकार कौन बनाएगा लेकिन एक अहम सवाल पीएम नरेंद्र मोदी को लेकर भी उठ रहा है कि यदि बीजेपी दोबारा सत्ता हासिल करने की स्थति में नहीं रही तो पीएम मोदी की भूमिका क्या रहेगी ?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्यों कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही पूरी बीजेपी दो चेहरों नरेंद्र मोदी और अमित शाह के इर्दगिर्द सिमट कर रह गयी है। पार्टी में पुराने चेहरों को उम्र का हवाला देकर हाशिये पर कर दिया गया। ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि यदि 2019 के आम चुनाव में बीजेपी सत्ता से बाहर हो गयी तो पीएम नरेंद्र मोदी का राजनैतिक भविष्य क्या होगा ?

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की पराजय की स्थति में पीएम नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर लोगों की अलग अलग राय हैं। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि पीएम मोदी नेता विपक्ष की हैसियत से राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका देंगे। वहीँ कुछ लोगों का कहना है कि नरेंद्र मोदी विपक्ष में बैठने के आदी नहीं हैं इसलिए यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगा कि वे नेता विपक्ष के तौर पर संसद में अपना समय देंगे।

नरेंद्र मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने संघ और बीजेपी के लिए एक साथ काम किया और वर्ष 2001 में वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने। वे गुजरात में लगातार चार बार मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी ने वाराणसी और वड़ोदरा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा था और दोनों ही सीटों पर विजय दर्ज करने के बाद उन्होंने वड़ोदरा सीट छोड़ दी थी।

नरेंद्र मोदी के राजनैतिक कैरियर को देखें तो साफ़ पता चलता है कि वे ऐसे नेता हैं जिन्हे विपक्ष का अनुभव नहीं हैं। ऐसे मेंबीजेपी के सत्ता से बेदलखल होने के बाद वे विपक्ष के नेता का पद स्वीकार करेंगे, इस बात को लेकर संदेह जताया जा रहा है।

वहीँ सवाल यह उठता है कि यदि नरेंद्र मोदी नेता विपक्ष का पद स्वीकार नहीं करते तो राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका क्या होगी ? जानकारों की माने तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के सत्ता से बेदखल होने की स्थति में नरेंद्र मोदी की राजनैतिक दिशा आरएसएस तय करेगा। ऐसा भी सम्भव है कि संघ नरेंद्र मोदी के बाद नितिन गडकरी या उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को आगे बढ़ाने की कोशिश करे।

वहीँ दूसरी स्थति में यदि बीजेपी सत्ता तक नहीं पहुँच पाती तो पराजय को लेकर आरएसएस बाद स्तर पर मंथन करेगा और इस मंधन के बाद संभव है कि बीजेपी अब तक जिन मुद्दों को लेकर जनता में अलख जगाने की कोशिश करती रही है उनमे से कुछ मुद्दों को किनारे रखकर बीजेपी का एक नया चेहरा सामने लाने की कोशिश हो सकती है।

जानकारों की माने तो संघ इस बात को समझ चूका है कि केवल हिंदुत्व के सहारे सत्ता में बने रहना मुमकिन नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता ने नरेंद्र मोदी पर भरोसा करके बीजेपी को भरपूर वोट दिया लेकिन चुनाव में जो वादे किये गए थे वे धरातल पर खरे नहीं उतरे। इसलिए संभव है कि संघ बीजेपी की कायापलट करने के प्रयासों के तहत कुछ ऐसे मुद्दों को छोड़ सकता है जो धर्म विशेष से जुड़े है।

हालाँकि यह पहली बार नहीं होगा, आरएसएस पहले भी बीजेपी के चेहरे बदलता रहा है। कभी गौ हत्या, कभी राम मंदिर कभी कश्मीर में धारा 370 तो कभी कॉमन सिविल कोड जैसे मुद्दे संघ की प्रयोगशाला में ही बने और वहीँ उनका पालनपोषण हुआ। इन मुद्दों को पहले संघ ने अपने मंचो से जनता के समक्ष रखा और जब ये मुद्दे जवान हो गए तो बीजेपी को थमा दिए गए।

जानकारों की माने तो अब वो पुराना समय नहीं है। यदि बीजेपी और संघ अपने मुद्दे पॉलिश करके जनता के बीच परोसती है तो दूसरी पार्टियां उन मुद्दों की परतें उधेड़नी शुरू कर देती हैं।

अहम कारण हैं कि वर्ष 2009 के बाद देश में तेजी से सोशल मीडिया के इस्तेमाल का चल बढ़ा है। मुद्दों को लेकर जनता को बहुत दिनों तक गुमराह नहीं रखा जा सकता। झूठ और गुमराही वाले मुद्दों की सच्चाई जनता के सामने पहुँचने से नहीं रोका जा सकता।

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