वो 6 अहम वादे जिन पर औंधे मूँह गिरी मोदी सरकार

ब्यूरो(राजाज़ैद)। मोदी सरकार को केंद्र में साढ़े चार साल से अधिक का समय बीत चूका है और अब उसके पास चंद महीने ही बाकी है। इन चंद महीनो में कोई करिश्मा होने की उम्मीद रखना खुद से बेमानी होगी।

2014 के आम चुनाव में जिन वादों के सहारे बीजेपी केंद्र की सत्ता में पहुंची उनमे से अहम वादे आज भी पूरे नहीं हुए हैं। बावजूद इसके बीजेपी नेता अभी भी मोदी सरकार को श्रेष्ठ सरकार होने का तमगा दे रहे हैं।

2014 में आम चुनावो से पहले बीजेपी ने ज़मीनी स्तर पर एक माहौल तैयार किया था। इस माहौल को भुनाकर ही बीजेपी भारी बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में पहुंची थी।

चुनाव पूर्व बीजेपी ने जनता को भरोसा दिलाया था कि यदि केंद्र में बीजेपी की सरकार बनती है तो उसे कई मायनो में बड़ी राहतें मिलेंगी। बीजेपी के चुनावी घोषणा पत्र में जिन बातो को शामिल किया गया था उन्हें नरेंद्र मोदी ने चुनावी मंचो से चाशनी लगाकर पेश किया था। यही बड़ा कारण था कि जनता भ्रमित होगयी।

मतदाताओं की वो श्रेणी (केटेगरी) जो उम्मीदवार को देखे बिना और सच जाने बिना नारो का शोर सुनकर वोट देती है, वह नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेताओं की मीठी बातो में उलझ कर रह गयी।

2014 में बीजेपी ने 6 अहम वादों को जनता के सामने रखा था। इन पांच वादों का निचोड़ अच्छे दिन लाना था। इन पांच वादों में विदेशो से काला धन वापस लाने और कालाधन वापस आने पर देश के प्रत्येक नागरिक के हिस्से में पंद्रह लाख आने का वादा, महंगाई कम करने, बेरोज़गारो को प्रतिवर्ष दो करोड़ नौकरियां देने, भ्रष्टाचार जड़ से मिटाने और सीमा पार से होने वाली आतंकवादी गतिविधियों पर रोक लगाने और गंगा की सफाई का वादा शामिल था।

हालाँकि इन पांच अहम वादों के अलावा भी कई वादे थे लेकिन फ़िलहाल इन्ही वादों को टटोला जाए तो पता चलता है कि पांच अहम वादों पर मोदी सरकार मूँह के बल गिरी है।

1-विदेशो से काला धन वापस लाने का वादा:

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बाबा रामदेव ने विदेशो से काला धन वापस लाने के लिए बीजेपी के पक्ष में बड़ा प्रचार किया था। आज वही रामदेव विदेशो से कालाधन वापस आने के मीडिया के सवाल पर कन्नी काटते नज़र आते हैं।

मोदी सरकार आज साढ़े चार साल बाद भी यह बताने में असफल है कि विदेशो में भारतियों का कुल कितना काला धन है। अपने वादे पर खानापूर्ति करने के लिए सरकार ने चंद लोगों के नाम की लिस्ट बाहर कर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ दिया।

यदि सरकार के पास विदेशो में जमा काले धन का व्यौरा नहीं है तो बाबा रामदेव ने यूपीए सरकार के समय विदेशो में जमा काले धन को लेकर जो आंकड़े मीडिया के सामने रखे थे, संभवतः ये आंकड़े मनगढ़ंत और झूठे थे।

विदेशो से काला धन वापस लाने के मोदी सरकार के वादे के साथ एक और वादा जुड़ा हुआ था। वह यह था कि यदि विदेशो से काला धन वापस आया तो देश के हर नागरिक के खाते में पंद्रह लाख यूँ ही आजायेंगे। ज़ाहिर है विदेशो से काला धन नहीं आया इसलिए पंद्रह लाख किसी को मिलने से रहे।

पीएम मोदी के पंद्रह लाख वाले वादे को खुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह चुनावी जुमला कह चुके हैं। यानि कि चुनावी मंच से कही गयी नेताओं की बातें झूठी भी हो सकती हैं।

2-महंगाई कम करने का वादा:

बीजेपी का एक और बड़ा अहम वादा देश में महंगाई कम करने का था। इस वादे पर भी बीजेपी खरी नहीं उतर सकी है। देश में पेट्रोल डीजल और रसोई गैस की कीमतें 2014 के बाद से लगातार बढ़ी हैं। वहीँ खाने पीने की वस्तुएं भी यूपीए सरकार की तुलना में सस्ती नहीं हुई हैं। महंगाई पर तथ्यों को छिपाने के लिए मोदी सरकार ने थोक महंगाई दर तय करने का आधार वर्ष 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया।

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने देश की जनता को एक लोकप्रिय नारा भी दिया था- ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अब की बार मोदी सरकार’। लेकिन यह नारा धरातल पर खरा नहीं उतरा। महंगाई पर तथ्यों को छिपाने के लिए मोदी सरकार लगातार आंकड़ों से खेल रही है।

26 मई 2014 को केंद्र में मोदी सरकार के आने से पहले एक किलो आटा देश के विभिन्न शहरों में 17 से 43 रुपये के बीच मिल जाता था जबकि आज आटे की खुदरा कीमत 20 से 50 रुपये प्रतिकिलो के बीच है। वहीँ मई 2014 में आमतौर पर रसोई में इस्तेमाल होने वाले चावल के दाम 15 से 35 रुपये थे जबकि आज 20 से 47 रुपये प्रति किलो हैं। इसके बावजूद सरकारी आंकड़ों में महंगाई कहीं नहीं है।

3-बेरोज़गारी:

2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने जनता से वादा किया था कि यदि केंद्र में उसकी सरकार बनी तो प्रतिवर्ष दो करोड़ लोगों को नौकरियां दी जाएँगी। रोज़गार उपलब्ध कराने में मोदी सरकार की गति पर यदि श्रम मंत्रालय के आंकड़े देखें तो मोदी सरकार की पोल खुल जाती है।

आंकड़ों की बाजीगरी में माहिर मोदी सरकार स्वरोज़गार योजना के अंतर्गत दिए गए बेरोज़गारो को क़र्ज़ का आंकड़ा देकर खुद की पीठ थपथपा रही है। नोट बंदी के दौरान असंगठित क्षेत्र के रोज़गार में आयी कमी से देश में यकायक बेरोज़गारी में तेजी से बढोत्तरी दर्ज की गयी।

यदि नोट बंदी के दौरान बेरोज़गार हुए लोगों को न भी गिना जाए तब भी मोदी सरकार प्रतिवर्ष दो करोड़ रोज़गार देने में फेल साबित हुई है। इस समय देश की आबादी का 11 फीसदी यानी करीब 12 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। हर रोज 550 नौकरियां कम हुई हैं और स्वरोजगार के मौके घटे हैं। यह आंकड़े हैं अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ और मोदी सरकार के श्रम मंत्रालय के रोजगार सर्वे के हैं।

इन आंकड़ों से साफ़ होता है कि बेरोज़गारो को रोज़गार देने के मामले में मोदी सरकार बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई है। हाल ही में आई अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि साल 2019 आते-आते देश के तीन चौथाई कर्मचारियों और प्रोफेशनल्स पर नौकरी का खतरा मंडराने लगेगा या फिर उन्हें उनकी काबिलियत के मुताबिक काम नहीं मिलेगा।

4-भ्रष्टाचार जड़ से खत्म करने का वादा:

2014 में मोदी सरकार को मिली सफलता का एक अहम कारण यूपीए सरकार के कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी था। हालाँकि टूजी जैसे घोटालो में कुछ नहीं निकला इससे सिर्फ यूपीए सरकार की बदनामी हुई। वहीँ आरएसएस, अन्ना हज़ारे ने यूपीए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलकर पहले से बदनाम होचुकी यूपीए सरकार के खिलाफ लोगों को उकसाने का काम किया।

आज अन्ना हज़ारे खामोश हैं। जबकि भ्रष्टाचार का आलम यह है कि देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई के अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। सीबीआई का दफ्तर रात में सील कर दिया जाता है। सीबीआई का एक अफसर रिश्वत के आरोप में जेल जाना पड़ता है।

इतना ही नहीं छत्तीसगढ़ में पीडीएस घोटाला, मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला और अब राफेल विमान डील पर खुल रही पोल से बीजेपी का ईमानदारी का सर्टिफिकेट धुंधला हो चला है। चूँकि राफेल डील को लेकर मामला सुप्रीमकोर्ट तक जा पहुंचा है इसलिए इस पर आज नहीं तो कल पर्दा उठ जाएगा।

5-सीमापार से आंतकवाद पर रोक:

जब 2014 के चुनाव के लिए प्रचार का काम चल रहा था तो बीजेपी समर्थको ने सोशल मीडिया पर दावे किये कि मोदी सरकार बनने के बाद लाहौर में तिरंगा फहराया जाएगा। इतना ही नहीं चुनाव प्रचार के दौरान स्वयं नरेंद्र मोदी ने कहा था कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जबाव देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

पाकिस्तान को जबाव देने की रस्म अदायगी के नाम पर सर्जिकल स्ट्राइक का उदाहरण देकर मोदी सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन हकीकत यह है कि न तो सीमापार से आतंकवाद रुका और न ही कश्मीर में आतंकी घटनाओं में कमी आयी है।

जिस समय मोदी सरकार ने देश में नोट बंदी लागू की थी, उस समय भी स्वयं पीएम नरेंद्र मोदी ने यह दावा किया था कि नोट बंदी से आतंकी और नक्सली घटनाओं पर रोक लगेगी। इसके बावजूद कश्मीर में आतंकी घटनाएं और छत्तीसगढ़ में नक्सली घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी है और इस तरह की घटनाएं बदस्तूर जारी है।

इसके विपरीत मोदी सरकार के कार्यकम में आतंकी हमलो में सैनिको के शहीद होने की तादाद बढ़ गयी है। साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल (SATP) के आंकड़ों के मुताबिक, 2014 से 2017 के बीच सबसे ज्यादा नागरिकों ने 2017 में अपनी जान गंवाई। यही हाल सुरक्षाबलों के शहीद होने का भी रहा है। जहां 2017 में आतंकी घटनाओं में 57 नागरिकों ने अपनी जान गंवाई, वहीं 218 जवानों शहीद हुए है।

26 मई, 2014 को देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने का संकल्प लिया था। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ ज्यादातर मौतें बीते 1.5 साल के दौरान हुईं।

6-गंगा की सफाई:

गंगा की सफाई को लेकर 2014 में बीजेपी ने बड़े दावे किये थे। दावा किया गया था कि गंगा को बिलकुल साफ़ और स्वच्छ बनाया जाएगा। आज मोदी सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल के पूरा होने के बावजूद गंगा की सफाई में कोई बड़ी प्रगति नहीं हुई है। गंगा की सफाई को लेकर मोदी सरकार की तरफ से अलग अलग समय पर अलग अलग दावे सामने आ रहे हैं।

नमामि गंगे परियोजना में पांच साल की अवधि के भीतर गंगा की सफाई के लिए ये करीब 21 हजार करोड़ रुपए की एक बड़ी कार्ययोजना की घोषणा की गयी थी। पहले इस मंत्रालय का कामकाज उमा भारती देख रही थीं लेकिन अचानक ही यह विभाग नितिन गडकरी को दे दिया गया।

ज़ाहिर है कि गंगा की सफाई को लेकर उमा भारती के प्रयासों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुश नहीं थे। इसलिए गंगा की सफाई का जिम्मा उमा भारती से लेकर नितिन गडकरी को दे दिया गया।

गंगा की सफाई को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कहा कि “सरकार ने गंगा सफाई पर करोड़ों रुपये ख़र्च तो कर दिए है लेकिन गंगा अभी भी पर्यावरण के लिए एक गंभीर विषय बना हुआ है। इसकी सफाई के लिए कोई क़दम नहीं उठाया गया।”

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण राज्य मंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने राज्यसभा में एक सवाल के जबाव में बताया कि वर्ष 2014 से जून 2018 तक गंगा नदी की सफाई के लिए 3,867 करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च की जा चुकी है। इसके बावजूद जब आरटीआई के माध्यम से सरकार से पूछा गया कि गंगा कितनी साफ़ हो चुकी है तो सरकार इसका जबाव देने में नाकाम रही।

समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक आरटीआई याचिकाकर्ता एवं पर्यावरणविद् विक्रम तोगड़ ने आरटीआई के तहत यह ब्योरा मांगा था कि अब तक गंगा की कितनी सफाई हुई है, लेकिन सरकार इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं करा पाई।

फ़िलहाल यह मान लिया जाए कि मोदी सरकार ने 2014 में जो 6 अहम वादे किये थे वह उन वादों पर खरी नहीं उतर सकी है। आंकड़ों की कारीगरी से बहुत दिनों तक पीठ नहीं थपथपाई जा सकती। नोट बंदी के दौरान चलन से बाहर किये गए पांच सौ और हज़ार के नोटों की गिनती को लेकर सरकार अलग अलग दावे करती रही लेकिन अंततः सच सामने आया कि सरकार नोट बंदी के अपने निर्णय को सही बताने के लिए कालाधन बाहर आने का जो दावा कर रही थी असल में वह झूठा और गुमराह करने वाला था।

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