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विपक्ष एकजुट हुआ तो मूँह के बल गिरेगा अमित शाह का दावा, ये हैं आंकड़े

ब्यूरो(राजा ज़ैद) : 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 350 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है . बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने मध्य प्रदेश के अपने दौरे के दौरान कहा कि पार्टी अब हर दिन इलेक्शन मोड में रहेगी .

चुनाव विशेषज्ञो की माने तो भारतीय जनता पार्टी के 350 प्लस सीटें जीतने के दावा तब ही सच हो सकता है जब वर्ष 2014की तरह कांग्रेस सहित सभी राजनैतिक दल अलग अलग चुनाव लड़ें . हालाँकि चुनाव के जानकार यह भी मानते हैं कि 2014 में नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर एक नया चेहरा थे और मतदाताओं ने उन पर विश्वास लिया लेकिन ज़रूरी नही कि मतदाताओं में यह विश्वास 2019 में भी उतना ही बरकरार रहेगा.

2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 31% वोट शेयर के साथ बीजेपी ने 282 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस को 19.3% वोट शेयर के साथ 44सीटें ही मिल सकीं . यदि एनडीए घटक दलों को मिले वोटों का प्रतिशत जोड़ दिया जाए तो बीजेपी और सहयोगी दलों को मिलकर कुल 38% हो जाता है वहीँ यूपीए घटक दलों का वोट शेयर 23% होता है .

चुनाव जानकारों के अनुसार यदि विपक्ष किसी तरह महागठबंधन बनाने में सफल हो गया तो बीजेपी को उन राज्यों में बड़ा झटका लग सकता है जिन राज्यों में उसने 2014 में उम्मीद से अधिक सीटें जीतीं थीं.

यदि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम पर एक नज़र डाले तो पता चलता है कि यहाँ बीजेपी को 40%, समाजवादी पार्टी को 22%, बसपा को 22%, कांग्रेस को 6% तथा रालोद को 2% वोट मिले थे . ऐसे में यदि विपक्ष को मिले वोट का प्रतिशत जोड़ा जाए तो 52% होता है जो बीजेपी को मिले वोटो शेयर से 12% अधिक है .

इस आंकड़े के हिसाब से यदि 2019 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा बसपा कांग्रेस और रालोद मिलकर लोकसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारें तो बीजेपी को बहुत मुश्किल से दस सीटें मिल पाएंगी जबकि 2014 में बीजेपी ने केवल 72सीटें तो उत्तर प्रदेश से ही जीतीं थीं .

इसी तरह कई राज्य हैं जहाँ महागठबंधन बनने से बीजेपी का उल्टा भी पड़ सकता है. अपने दावे को मजबूत करने के लिए बीजेपी की कोशिश है कि नीतीश कुमार के जेडीयू की तरह कई अन्य दलों को भी एनडीए में शामिल कर लोकसभा चुनाव लड़ा जाए. संभवतः अपनी इसी रणनीति के तहत भारतीय जनता पार्टी तमिलनाडू में अन्ना द्रमुक को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है.

वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष की तरफ से महागठबंधन बनाने के प्रयास जारी हैं. जानकारों के मुताबिक बीजेपी को सत्ता से रोकने के लिए सिर्फ महागठबंधन बनना ही काफी नही होगा बल्कि महागठबंधन को चलाना भी बड़ी चुनौती होगी.

जानकारों के अनुसार महागठबंधन बनने के बाद विपक्ष के समक्ष सीटों का बंटवारा भी एक अहम मुद्दा होगा. लोकसभा चुनाव में किस राजनैतिक दल को कितनी सीटें मिलेंगी इस पर पेंच फंस सकता है .

2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावो के दौरान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर काफी दिनों तक पेंच फंसा रहा. जबकि मामला सिर्फ दो पार्टियों के बीच का था. महागठबंधन में 18 से 20 राजनैतिक दलों के बीच आम राय बना पाना आसान नही होगा .

आम आदमी पार्टी और ओवैसी को भी करना होगा शामिल:

चुनावी जानकारों का कहना है कि यदि विपक्ष महागठबंधन बनाने में सफल रहता है तो उसे आम आदमी पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी वाली आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन को भी अपने साथ लेना होगा. जानकारों की राय है कि भले ही दोनो पार्टियों को पूरे देश में जनाधार नही है लेकिन विपक्ष की एकता के लिए यह ज़रूरी होगा कि किसी भी तरह इन पार्टियों को भी महागठबंधन का हिस्सा बनाया जाए .

जानकारों का कहना है कि जिस तरह असम में एआईयूडीऍफ़ से बिना गठबंधन किये कांग्रेस को आसाम में सत्ता गंवानी पड़ी उसी तरह आम आदमी पार्टी और एआईएम्आईएम् को भी कम करके नही आँका जाना चाहिए. मुस्लिम मतदाताओं को साथ जोड़े रखने के लिए ओवैसी अच्छी भूमिका निभा सकते हैं .

विधानसभा चुनावो के परिणाम से पड़ेगा फर्क:

2019 से पहले होने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावो के परिणाम भी बीजेपी के दावे को पलट सकते हैं . बता दें कि गुजरात और हिमाचल में इसी वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं. वहीँ मिजोरम, कर्णाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं . इन राज्यों में सत्ता परिवर्तन होने की दिशा में बीजेपी को लोकसभा चुनाव में खामियाजा भुगतना पड़ सकता है .

अभी मोदी सरकार के कार्यकाल में खासा समय बाकी है, इसलिए ये नही कहा जा सकता कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कौन से मुद्दे प्रमुख होंगे लेकिन इतना तय है कि यदि विपक्ष एकजुट हुआ तो बीजेपी को भारी नुकसान हो सकता है .

 

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