राफेल पर रिपोर्ट में खुलासा: सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने के प्रावधानों को हटा दिया था

नई दिल्ली। राफेल विमान डील को लेकर एक के बाद एक नये खुलासे हो रहे हैं। अब अंग्रजी अख़बार ‘द हिन्दू’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि राफेल सौदे पर हस्ताक्षर से कुछ दिन पहले सरकार की तरफ से मानक रक्षा खरीद प्रक्रिया में बदलाव करते हुए भ्रष्टाचार विरोधी कुछ मुख्य प्रावधानों को हटा दिया गया था।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत और फ्रांस के बीच 7.5 बिलियन यूरो में किए गए राफेल विमान के सौदे में भारत सरकार की ओर से बड़ी और अभूतपूर्व रियायतें दी गई थीं। अंतर सरकार समझौता (आइजीए) पर हस्ताक्षर करने से कुछ दिन पहले भ्रष्टाचार रोधी जुर्माना के लिए महत्वपूर्ण प्रावधानों और एक एस्क्रॉ अकाउंट के जरिये भुगतान करने की शर्तों को हटा दिया गया था।

वहीँ राफेल डील को लेकर हुए नए खुलासे के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर मोदी सरकार की घेराबंदी शुरू करदी है। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ की एक खबर शेयर करते हुए ट्वीट किया, ‘मोदी जी, राफेल सौदे में सॉवरन गारंटी माफ करने के बाद अपने भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधान में भी छूट दे दी। आखिर आप कौन सा भ्रष्टाचार छिपाना चाहते थे?”

वहीँ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा, ‘सरकार ने जितना सोचा नहीं था, उससे ज्यादा तेजी से राफेल सौदे में खुलासे हो रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि पहले कीमत बढ़ाई गई, फिर यह खुलासा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने समानांतर बातचीत करके भारतीय वार्ता दल के प्रयासों को कमजोर किया। अब यह खुलासा हुआ है कि मानक रक्षा खरीद प्रक्रिया के प्रावधानों में बदलाव किए गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दसाल्ट को इस सौदे में फायदा ही फायदा हुआ है।

क्या है ‘द हिन्दू’ की रिपोर्ट में :

अंग्रेजी अखबार द हिंदू का दावा है कि उनके पास मौजूद आधिकारिक दस्तावेज में यह उल्लेखित है कि तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर परिकर की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 2016 में अंतर सरकार समझौता, आपूर्ति प्रोटोकॉल, ऑफसेट अनुबंध और ऑफसेट शेड्यूल में आठ बदलावों को “परिवर्तन और अनुमोदित” किया।

वाइस एडमिरल अजीत कुमार द्वारा हस्ताक्षरित एक नोट में कहा गया है: “आपूर्ति प्रोटोकॉल में ‘अनुचित प्रभाव के लिए दंड, एजेंट्स /एजेंसी कमीशन’, और ‘कंपनी खातों तक पहुंच’ से संबंधित मानक डीपीपी के नियम से हटाए जाएं।”

उच्च-स्तरीय राजनीतिक हस्तक्षेप का मतलब था कि मानक रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) से डसॉल्ट एविएशन और एमबीडीए फ्रांस के “अनुचित प्रभाव, एजेंट्स / एजेंसी कमीशन, और कंपनी खातों तक पहुंच के लिए दंड” के नियम को भारत सरकार ने आपूर्ति प्रोटोकॉल से हटा दिया।

द हिंदू के पास मौजूद आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर परिकर की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने सितंबर 2016 में मुलाकात की, और अंतर सरकार समझौता (आइजीए), आपूर्ति प्रोटोकॉल, ऑफसेट अनुबंध और ऑफसेट शेड्यूल में आठ बदलावों को “परिवर्तन और अनुमोदित” किया। यह 24 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में रक्षा सौदों की कैबिनेट समिति (सीसीएस) की आईजीए और संबंधित दस्तावेजों को सहमति दिए जाने के बाद किया गया था।

इन आठ बदलावों में सबसे अहम बदलाव उप-पैरा (सी) में किया गया, जो वाइस एडमिरल अजीत कुमार द्वारा हस्ताक्षरित एक नोट में दर्ज है। अजित कुमार डीसीआईडीएस (पीपी एंड एफडी) और डीएसी के सदस्य-सचिव थे। इसमें कहा गया है: “आपूर्ति प्रोटोकॉल में ‘अनुचित प्रभाव के लिए दंड, एजेंट्स / एजेंसी कमीशन’, और ‘कंपनी खातों तक पहुंच’ से संबंधित मानक डीपीपी के नियम से हटाए जाएं।”

यह बेहद महत्वपूर्ण है कि भारत सरकार द्वारा आपूर्ति प्रोटोकॉल से इन नियमों को हटा दिया गया था। जबकि अंतर सरकार समझौता (आइजीए) भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच बड़ा समझौता था, और दो निजी कंपनियों डसॉल्ट और एमबीडीए को आपूर्ति प्रोटोकॉल का पालन करना था।

वहीँ सरकार की तरफ से यह दावा किया जा रहा है कि उसने यूपीए काल की नीति के अनुसार ही करार किया। साल 2013 में यूपीए सरकार एक नई नीति लेकर आई थी, जिसके तहत रक्षा मंत्रालय को निर्धारित नियमों का पलान न करने और जिन देशों से अच्छे संबंध हैं, उनके साथ दोनों पक्षों के बीच पारस्परिक रूप से सहमत प्रावधानों के अनुसार अतंर सरकारी समझौता साइन करने की अनुमति दी गई थी।

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