योगी सरकार के UPCOCA कानून को क्यों कहा जा रहा है “मुस्लिम विरोधी”

लखनऊ ब्यूरो। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा प्रदेश में लाये जा रहे UPCOCA कानून को मुस्लिम विरोधी कहा जा रहा है। संगठित अपराधों पर लगाम लगाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने बुधवार को विधानसभा में यूपीकोका (उत्तरप्रदेश कंट्रोल ऑफ आर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट) बिल पेश किया।

सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून के तहत अंडरवर्ल्ड, जबरन वसूली, जमीनों पर कब्जा, वेश्यावृत्ति, अपहरण, फिरौती, धमकी और तस्करी जैसे अपराधों को शामिल किया गया है। लेकिन समाजवादी पार्टी सहित तमाम विपक्ष तथा मुस्लिम संगठनों इस प्रस्तावित कानून को मुस्लिम विरोधी बताया है।

हालाँकि इससे पहले बसपा शासनकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने भी इसी से मिलता जुलता एक कानून लाने के प्रयास किये थे लेकिन प्रदेश में सरकार के इस प्रस्तावित कानून के विरोध को देखते हुए मायावती ने उसे ठन्डे बस्ते में डालना ही बेहतर समझा।

अब प्रदेश की योगी सरकार ने भी इसी तरह का कानून लाने की पेशकश की है लेकिन इसका अभी से विरोध होना शुरू हो गया है। विपक्ष के अलावा मुस्लिम संगठनों ने भी इस प्रस्तावित कानून का विरोध करना शुरू कर दिया है। बढ़ते विरोध के बीच योगी सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।

क्यों हो रहा विरोध:

1 – इस कानून के तहत किसी गिरफ़्तार व्यक्ति को 6 महीने से पहले ज़मानत नहीं मिले सकेगी।

2 – आरोपी की पुलिस रिमांड 30 दिन के लिए ली जा सकती है, जबकि बाकी क़ानूनों के तहत 15 दिन की रिमांड ही मिलती है।

3 – इससे शक के आधार पर हिरासत में लिए गए किसी निर्दोष को जल्द ज़मानत नहीं मिल सकेगी।

4 – अपराधी को पांच साल की सजा और अधिकतम फांसी की सजा का प्रावधान होगा।

5 – आरोपी को यह पता नहीं चल सकेगा कि उसके खिलाफ गवाही देने वाला कौन है।

6 – पुलिस की मनमानी बढ़ेगी। आम तौर पर रस्सी का सांप बनाकर सबूत पेश करनी वाली पुलिस के लिए आरोप सिद्ध करना आसान हो जायेगा।

क्या कहते हैं मुस्लिम संगठन:

उत्तर प्रदेश में निर्दोष मुस्लिमो की रिहाई से जुड़े संगठन रिहाई मंच का कहना है कि सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाजों को हिंसक करार देकर योगी सरकार यूपीकोका के जरिए लोकतंत्र का गला घोटने पर उतारु है।

रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि यूपीकोका में आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने की शर्त साफ करती है कि यह निरंकुश टाडा-पोटा जैसे गैरलोकतांत्रिक कानूनों की ही अगली कड़ी है।

यूपीकोका के अंतर्गत मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक लगाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सरकार ने हमला बोला है। आरोपी के मुलाकातियों पर सख्ती की बात साफ करती है कि न सिर्फ उसके मौलिक अधिकारों का हनन होगा बल्कि उसकी प्रताड़ना का संशय बराबर बना रहेगा।

उन्होंने कहा कि जब सामान्य कानूनों के नाम पर योगी सरकार ने फर्जी मुठभेड़ों का इतना क्रूरतम अध्याय 6 महीने में लिख दी की एनएचआरसी को उसे नोटिस करना पड़ा तो साफ है कि यूपीकोका के बल पर वह भाजपा की सांप्रदायिक जेहनियत के तहत मुसलमानों-दलितों पर हमलावर होगी। मुहम्मद शुऐब ने कहा कि यूपीकोका के जरिए प्रशासन को निरंकुश बनाकर लोकतंत्र को सैन्यतंत्र में तब्दील करने की यह फासिस्ट कोशिश है।

अवामी काॅउंसिल के महासचिव अधिवक्ता असद हयात ने कहा कि कठोर कानूनों के बनाए जाने का उस समय कोई अर्थ नहीं रह जाता जब वे बिना किसी सार्थक परिणाम के हों। वर्तमान संदर्भ प्रस्तावित यूपी कोका का है जिसमें प्रावधान किया जा रहा है यह कानून जिन अपराधियों के विरुद्ध लाया जा रहा है उनका सर्वप्रथम आपराधिक इतिहास होना चाहिए और द्वितीय यह की उनके विरुद्ध कम से कम दो मामलों में आरोप पत्र हो और दोष सिद्ध भी हुए हों। इस स्थिति में सरकार को पहले यह बताना चाहिए कि ऐसे कितने अपराधी हैं जो वर्तमान कानूनों के चंगुल से बाहर निकल गए हों और उनके लिए यूपीकोका जैसे कानून लाना अनिवार्य हो गया हो?

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