ये है साध्वी प्रज्ञा को टॉर्चर किये जाने के आरोपों का सच

नई दिल्ली। मालेगांव ब्लास्ट में आरोपी साध्वी प्रज्ञा ने मुंबई हमले में शहीद हुए तत्कालीन एटीएस चीफ हेमंत करकरे पर गिरफ्तारी के बाद कथित तौर पर टॉर्चर करने के जो आरोप लगाए हैं उन्हें राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग पहले ही ख़ारिज कर चुका है।

साध्वी प्रज्ञा 2008 में हुए मालेगांव ब्लास्ट में मुख्य आरोपियों में से एक हैं। अपनी गिरफ्तारी के बाद साध्वी प्रज्ञा ने एटीएस अधिकारीयों पर मारपीट और टॉर्चर करने के गंभीर आरोप लगाए थे। आरोपों में यहाँ तक कहा गया था कि खुद तत्कालीन एटीएस चीफ हेमंत करकरे ने भी उनसे पूछताछ के दौरान शारीरिक यातनाएं दी थीं।

अगस्त 2014 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को एक कमेटी बनाकर साध्वी प्रज्ञा को टॉर्चर किये जाने की जांच करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद साध्वी प्रज्ञा द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच के लिए पुलिस के वरिष्ठ अधिकारीयों की एक टीम गठित की गयी। इस टीम में डीआईजी आर एस खैरे, के एच खुर्लेकर (डिप्टी सुपरिंटेंडेंट यरवाडा सेंट्रल जेल), एम कुलकर्णी (इंस्पेक्टर सीआईडी, पुणे) और रश्मि जोशी दक्षिता समिति (एनजीओ) आदि शामिल थे।

साध्वी प्रज्ञा के आरोपों की जांच पड़ताल के लिए जांच टीम ने जेल, कोर्ट और उस अस्पताल से सबूत जुटाए जहाँ साध्वी प्रज्ञा को एडमिट किया गया था। 2015 में यह मामला बंद कर दिया गया और रिपोर्ट में कहा गया कि अब इस मामले में आगे जांच की आवश्यकता नहीं है।

वर्ष 2008 में मालेगांव ब्लास्ट में साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी के बाद उन्हें 24 अक्टूबर 2008 और 03 नवंबर 2008 को नासिक के चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया लेकिन उन्होंने मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसी कोई बात नहीं कही जिससे यह साबित हो कि उन्हें शारीरिक रूप से टॉर्चर किये गया है। 2011 के सुप्रीमकोर्ट के फैसले में भी इस बात का उल्लेख है।

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