मध्यप्रदेश में दो दर्जन विधायकों के टिकिट काट सकती है कांग्रेस

नई दिल्ली। इस वर्ष के अंत तक मध्य प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनावो के मद्देनज़र कांग्रेस ने अभी से कमर कसनी शुरू कर दी है। वहीँ विधानसभा चुनाव में टिकिट के लिए पार्टी नेताओं ने भी दिल्ली भोपाल के चक्कर लगाना शुरू कर दिया है।

पार्टी सूत्रों की माने तो सभी सिटिंग एमएलए को पिछले दो वर्ष के दौरान अपनी अपनी विधानसभाओं में किये गए कार्यो, पार्टी के कार्यक्रमों और जनसम्पर्क का व्यौरा माँगा गया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक जो विधायक निष्क्रिय रहे हैं उनकी जगह नए चेहरों को मौका दिया जायेगा।

सूत्रों ने कहा कि करीब दो दर्जन विधायक ऐसे हैं जिनके काम के बारे में आलाकमान के पास नेगेटिव रिपोर्ट पहुंची है और पूरी सम्भावना है कि इन सिटिंग एमएलए की जगह पार्टी नए चेहरों को मौका दे।

सूत्रों के मुताबिक हाईकमान द्वारा प्रदेश कांग्रेस कमेटी से एक एक विधानसभा का आंकड़ा माँगा गया है। जिससे समय रहते हर विधानसभा पर गहराई से चर्चा हो सके और समीक्षा की जा सके।

सूत्रों ने कहा कि उत्तर प्रदेश और राजस्थान में लोकसभा के उपचुनाव सम्पन्न होने के बाद गुजरात की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस परिवर्तन यात्रा की तर्ज पर प्रदेशभर में किसी बड़े कार्यक्रम का आयोजन करने की घोषणा करेगी। सूत्रों की माने तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रदेश के सभी नेताओं को एकजुट होकर चुनाव लड़ने के निर्देश दिए हैं साथ ही कहा है कि कांग्रेस के कार्यक्रमों में सभी बड़े नेता एक मंच पर मौजूद रहें।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की गुटबंदी अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक मानी जाती है। मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी के बावजूद कांग्रेस यहाँ बनवास काटने को मजबूर है।

सूत्रों ने कहा कि इस बार टिकिट वितरण से लेकर चुनावी रणनीति और मैनेजमेंट तक पूरा काम देखने के लिए हाईकमान गाइडलाइन तय करेगा। कांग्रेस राज्य में किसे मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करेगी ये अभी तय नहीं है लेकिन माना जा रहा है कि कांग्रेस किसी तरह की गुटबंदी की सम्भावना को खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री के चयन का मामला विधायक दल पर छोड़ सकती है।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में 230 विधानसभा सीटे हैं। जिनमे से बीजेपी के पास 165, कांग्रेस के पास 57 और बसपा के पास 04 सीटें हैं। यहां वर्ष 2003 से बीजेपी सत्ता में हैं। चुनावी नतीजे बताते हैं कि मध्य प्रदेश में 1967 से अब तक कभी भी त्रिशंकु विधानसभा के आसार नहीं बने हैं। राज्य के मतदाताओं ने एक पार्टी को हमेशा इस तरह वोट दिया है कि वह अपने बूते सरकार बना सके।

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