बीजेपी नहीं नरेंद्र मोदी हारे

ब्यूरो (राजा ज़ैद)। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने के उपलक्ष में बड़े स्तर पर जश्न मनाने की तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटी थी लेकिन गोरखपुर और फूलपुर उपचुनावों के नतीजों ने उसे जश्न मनाने से पहले पराजय का मातम मनाने पर विवश कर दिया है।

गोरखपुर और फूलपुर भी अन्य लोकसभा क्षेत्रो की तरह ही थीं लेकिन चूँकि वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या से जुडी थीं इसलिए पराजय की ज़िम्मेदारी तो लेनी ही होगी। बीजेपी भले ही इस पराजय के लिए किसी को ज़िम्मेदार माने या न माने लेकिन अमेठी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर हमला साधने वाले अपनी ही लोकसभाएँ हार गए हैं।

इस पराजय के कई मायने हैं। फिलहाल यह माना जा रहा है कि बीजेपी ने गोरखपुर या फूलपुर नहीं हारा बल्कि ये हार स्वयं पीएम नरेंद्र मोदी की है, सीएम योगी आदित्यनाथ की है और पूरी बीजेपी की है।

29 साल तक गोरखपुर पर बीजेपी का कब्ज़ा रहा लेकिन उससे गोरखपुर को क्या मिला। यह वह अहम सवाल है जो गोरखपुर की जनता को आज नहीं तो कल सोचना ही था।

केंद्र और राज्य में पूर्ण बहुमत वाली बीजेपी की सरकारों की मौजूदगी के बावजूद पिछले ग्यारह महीनो में उत्तर प्रदेश में विकास के नाम पर चंद घोषणाएं अवश्य हुईं लेकिन ये घोषणाएं धरातल पर दिखाई नहीं दे रहीं।

उत्तर प्रदेश को अपराध मुक्त बनाने का दावा करने वाली योगी सरकार के ग्यारह महीनो के कार्यकाल में हिन्दू वाहिनी की गुंडागर्दी से लेकर फ़र्ज़ी एनकाउंटर जैसे मामले अवश्य सामने आते रहे हैं।

लोकसभा उपचुनाव पर दो अहम सीटों पर पराजय के लिए गोरखपुर में बच्चो की ताबड़तोड़ मौत पर योगी सरकार की लीपापोती से लेकर प्रदेश सरकार के मंत्रियों और स्वयं सीएम योगी के वे गैर ज़रूरी बयान और अति उत्साह से भरा होना भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार हैं। जिनके चलते कहीं न कहीं जनता का मोह भंग हुआ है।

फिलहाल बीजेपी इस पराजय का ठीकरा भले ही पीएम मोदी और सीएम योगी पर न भी फोड़े तब भी इस पराजय का एक बड़ा सन्देश यही है कि बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। अच्छे दिन आने वाले हैं ये बताने की ज़रूरत क्या है ? अच्छे दिन आये या नहीं आये ये जनता स्वयं महसूस करेगी।

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