बिना रसूकदारों की मदद के सम्भव नहीं इतना बड़ा घोटाला

नई दिल्ली। आमतौर पर कोई सामान्य व्यक्ति बैंक से कर्ज मांगता है तो बैंक कई बहाने बना कर उसे टहला देती हैं। कर्ज देने से पहले कर्ज मांगने वाले व्यक्ति की हैसियत से लेकर उसके खाते का ट्रांजेक्शन तथा रीपेमेंट केपेसिटी की पूरी जांच की जाती है।

इतना ही नहीं एक किसान जब बैंक से ट्रेक्टर या सिचाई नलकूप के लिए कर्ज मांगता है तो न सिर्फ उसकी ज़मींन बल्कि उसका ट्रेक्टर में भी कर्ज की अदायगी तक बंधक रहता है। साथ ही ज़मींन और ट्रेक्टर बंधक रखने के बाद ही किसान को कई बैंको से नो ड्यूज सर्टिफिकेट भी लेना होता है। किसान की ज़मीन और मकान के सर्वे से सतुष्टि के बावजूद बैंक बंधक रखी गयी ज़मीन का 12 साल या 20 का रिकॉर्ड निकलवा कर यह संतुष्टि भी करती है कि क्या सचमुच यह ज़मींन किसान के नाम पर है अथवा नहीं।

आम आदमी को कर्ज देने की एवज में बैंको की औपचारिकताओं की सूची यहीं समाप्त नहीं होती। क़र्ज़ देने से पहले बैंक स्टाम्प पर अग्रीमेंट भी साइन कराती है उसके अलावा दो गवाहो की गवाही भी लेती है।

बड़े आश्चर्य की बात यह है कि ये औपचारिकताएं सिर्फ आम लोगों ही लागू होती हैं। जिन लोगों को कर्ज की वास्तव में आवश्यकता होती है उनकी तुलना में पूंजीपतियों को कर्ज आसानी से मिल जाता है। इस मामले में विजय माल्या से लेकर नीरव मोदी और विक्रम कोठरी तक सभी की दास्तान एक जैसी है।

देश के बैंको को चूना लगाकार भागे लोगों में कोई गरीब और सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि वे रसूकदार लोग हैं जो देश की बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोगों के आसपास दिखा करते थे। ज़ाहिर है विजय माल्या, नीरव मोदी और विक्रम कोठारी जैसे लोगों के बड़ी कुर्सियों के रसूक का फायदा भी लिया गया होगा।

बैंको को बड़ा चूना लगाने वाले तीन लोगों की कहानी एक जैसी ही है। अहम सवाल यह है कि बैंको ने किस तरह नियम विरुद्ध जाकर इन लोगों को क़र्ज़ पर क़र्ज़ दिया और बैंक के आला अधिकारी आँखें बंद किये बैठे रहे।

आखिर किस की सिफारिश पर क़र्ज़ दिए गए। बैंको को चूना लगाने वाले लोगों के पीछे कौन उनका गॉड फादर बनकर खड़ा था ? इसका खुलासा होना बेहद ज़रूरी है।

नीरव मोदी और विजय माल्या के बारे में जो सच्चाई सामने आ रही है उसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि वे क़र्ज़ चुकाने की नीयत रखते थे। ऐसे में ये सवाल भी किया जाना चाहिए कि विजय माल्या और नीरव मोदी खुद से देश छोड़कर भागे या उन्हें विदेश भगाने में भी रसूकदारों ने मदद दी।

(राजा ज़ैद)

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