बहिनजी की मुश्किल: सपा का वोट बसपा उम्मीदवार को ट्रांसफर हो इसकी कोई गारंटी नहीं

नई दिल्ली(राजा ज़ैद)। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बने सपा बसपा गठबंधन में अब कांग्रेस की एंट्री नहीं होगी। लिहाजा अब यह तय है कि प्रदेश की अधिकांश सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय होगा।

खुद को किंग मेकर मानकर चल रही बसपा की ज़िद्द के चक्कर में सपा बसपा गठबधन में कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने मंगलवार को साफ़ तौर पर कहा कि वे कांग्रेस के साथ किसी तरह के गठबंधन के लिए तैयार नहीं हैं और उत्तर प्रदेश में सपा बसपा गठबंधन अपने आप में काफी है।

बसपा सुप्रीमो ने ऐसा ही कुछ बयान 2014 के लोकसभा चुनाव में दिया था। उस समय बसपा सुप्रीमो का कहना था कि वे अपने बूते प्रदेश की 40 सीटें जीतने में सक्षम हैं लेकिन जब परिणाम आया तो उत्तर प्रदेश में बसपा का खाता तक नहीं खुला। अहम कारण था प्रदेश की सभी अधिकतर सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला होना।

इस बार मायावती मानकर चल रही हैं कि पिछले चुनाव में सपा बसपा के वोट बंटने के चलते बीजेपी को कामयाबी मिली। इसलिए इस बार वे मानकर चल रही हैं कि सपा बसपा के गठबंधन के चलते दोनों दलों को फायदा होगा।

ज़मीनी हकीकत और पिछले कुछ अनुभवों को देखें तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सपा का परमपरागत वोट पूरा का पूरा बसपा को मिले या बसपा का परम्परागत वोट पूरा का पूरा सपा को मिले।

सपा मुस्लिम और यादव मतदाताओं को और बसपा दलित और मुस्लिम मतदाताओं को अपना ट्रेडिशनल वोट कॉम्बिनेशन मानती है। जहाँ तक मुस्लिम मतदाताओं का प्रश्न है तो इस बार मुस्लिम मतदाताओं की सोच थोड़ी बदली दिख रही है। उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाता उसी को वोट करेंगे जो बीजेपी को हारने में सक्षम दिखेगा, इसलिए ज़रूरी नहीं कि हर लोकसभा सीट पर मुस्लिम मतदाता सपा बसपा गठबंधन के उम्मीदवार को ही वोट करें, वे कांग्रेस के उम्मीदवार को भी वोट कर सकते हैं।

अब बात करते हैं सपा बसपा के उस वोट बैंक की जो हमेशा उसके साथ रहा है। समाजवादी पार्टी का यादव मतदाता और बसपा का दलित मतदाता उसका कोर वोटर माना जाता है। बसपा गठबंधन को लेकर जोई भी दावे करे लेकिन एक सच्चाई यह है कि सपा बसपा गठबंधन से अधिक फायदा सपा को होने जा रहा है। एक और बात जो संदेह पैदा करती है वह यह है कि क्या बसपा से जुड़ा दलित मतदाता सपा उम्मीदवार को वोट देगा या सपा से जुड़ा यादव मतदाता बसपा उम्मीदवार को वोट देगा ?

यह एक ऐसा सवाल है जिसका जबाव सपा और बसपा के शीर्ष नेताओं ने खोजने की कोशिश अवश्य की होगी लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके होंगे। सपा बसपा गठबंधन से समाजवादी पार्टी के वे पुराने नेता खुश नहीं हैं जिन पर मायावती सरकार में मुकदमे लिखे गए थे। स्वयं सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव भी अपने बेटे अखिलेश यादव के इस फैसले से खुश नहीं हैं और अभी हाल ही में उन्होंने ऐसा इशारा भी दिया था।

उत्तर प्रदेश का राजनैतिक इतिहास उठाकर देखा जाए तो एक समय सपा बसपा एक दूसरे के बड़े दुश्मन भी हुआ करते थे। अखिलेश यादव के चाचा और प्रोग्रेसिव समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल यादव पुराने दिनों का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि बसपा सुप्रीमो मायवती उन्हें और सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के लिए अपशब्द कहती थीं और उन्हें गुंडा बताती थीं।

राजनीति में अखिलेश यादव की एंट्री पैराशूट लेंडिंग है। जबकि शिवपाल मजे हुए खिलाडी हैं और अखिलेश की तुलना में बेहद अनुभवी है। ऐसे में बसपा सपा गठबंधन को लेकर शिवपाल का बयान यह साबित करने के लिए काफी है कि इस गठबंधन से पुराने समाजवादी नेता खुश नहीं हैं। खासकर वे समाजवादी जिन्होंने मायावती सरकार में संघर्ष किया और उनके खिलाफ मुकदमे लिखे गए।

इसलिए बसपा जो सोचकर चल रही है वह ठीक वैसे ही हो जाए ये मुमकिन नहीं है। हालाँकि कहते हैं कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता लेकिन यहाँ मतदाताओं को तय करना है कि वे कौन सा रास्ता चुनते हैं।

चुनावी जानकारों की माने तो सपा बसपा गठबंधन से उत्तर प्रदेश का जातिगत आंकड़ा गठबंधन के पक्ष में हो जाता है लेकिन दोनों दलों के वोट एक दूसरे को ट्रांसफर न हो पाना बड़ी मुश्किल भी बन सकता है जिसका सीधा लाभ बीजेपी को मिलेगा।

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