नए साल में बीजेपी में बाहर और अंदर बड़े तूफ़ान की आहट

नई दिल्ली(राजाज़ैद)। 2019 के आम चुनावो की तैयारी में जुटी भारतीय जनता पार्टी का असल इम्तेहान अब शुरू होगा। नए साल में पार्टी के भीतर और बाहर से आने वाले बड़े तूफान के अभी से संकेत मिल रहे हैं। इसलिए आने वाला समय बीजेपी नेतृत्व के लिए बेहद चुनौतीभरा हो सकता है।

2014 के लोकसभा चुनाव में किये गए सभी वादे पूरे न हो पाना बीजेपी के लिए 2019 के चुनाव में परेशानी का सबब बनेगा। अगले आम चुनाव से पहले बीजेपी को देश के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करना है।

पार्टी को बताना होगा कि राम मंदिर निर्माण क्यों नहीं हुआ, गंगा की सफाई का काम कितना हुआ, प्रतिवर्ष दो करोड़ नौकरियों के सृजन के वादे पर मोदी सरकार कितने रोज़गार दे पाई, मेक इन इंडिया में भारत ने क्या गज़ब किया, देश की कितनी सिटी स्मार्ट बनी, विदेशो से काला धन वापस लाने के वादे का क्या हुआ इत्यादि इत्यादि।

भले ही बीजेपी अपने 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में राम मंदिर निर्माण को लेकर चतुराई भरे शब्दों का इस्तेमाल करके इस मुद्दे पर खुद को बचाने की कोशिश करे लेकिन इसके बावजूद कुछ ऐसे लोग भी हैं जो चुनाव के समय बीजेपी को इसी मुद्दे पर घेरने को अभी से तैयार बैठे हैं।

वहीँ दूसरी तरफ पार्टी के अंदर और बाहर कई बवंडर पैदा हो चुके हैं जो कभी भी तूफ़ान की शक्ल ले सकते हैं। पहले खतरा एनडीए के सहयोगी दलों के टूटने को लेकर है और दूसरा खतरा पार्टी के कई सांसदों के ठिकाने बदलने को लेकर है।

सूत्रों की माने तो पार्टी के अंदर दो खेमे आमने आमने हैं। एक खेमा उन उदारवादी भाजपा नेताओं का है जो कहीं न कहीं अटल-आडवाणी युग में पार्टी के लिए बड़ा योगदान दे चुके हैं। इस खेमे का राजनैतिक अस्तित्व समाप्त करने के लिए खेमे से जुड़े नेताओं को हाशिये पर धकेलने का काम जारी है। सम्भवतः यही कारण है कि आगामी आम चुनाव के एलान से बहुत पहले ही सुषमा स्वराज, उमा भारती, अरुण जेटली जैसे नेताओं ने चुनाव न लड़ने का एलान कर दिया है।

वहीँ अभी इस बात की संभावना बनी हुई है कि नए साल में पार्टी के कुछ और नेता भी चुनाव न लड़ने का एलान करते हुए खुद को बीजेपी के चुनाव प्रचार से अलग कर लें।

माना जा रहा है कि 2019 यानि चुनावी वर्ष के पहले महीने जनवरी से ही बहुत कुछ उतार चढ़ाव सामने आना शुरू हो जाएंगे और जैसे जैसे चुनाव का समय करीब आएगा पार्टी के बाहर और अंदर मडरा रहे बवंडर अपनी ताकत आजमाईश शुरू कर सकते हैं।

जहाँ तक एनडीए के सहयोगी दलों का प्रश्न है तो टीडीपी और लोकसमता पार्टी पहले ही एनडीए का साथ छोड़ चुके हैं और अब उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे को लेकर सहयोगी दलों ने अपना दबाव बनाना शुरू कर दिया है। सुहेलदेव समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर के बाद अब अपना दल ने एनडीए में सम्मान न मिलने की बात कही है।

वहीँ शिवसेना लगातार बीजेपी और मोदी सरकार पर हमले बोल रही है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना बीजेपी का हाथ छुड़ाकर अलग राह पकड़ सकती है। जिससे बीजेपी को महाराष्ट्र में बड़ा घाटा हो सकता है।

पार्टी के अंदर उठ रहे बवंडरों की बात करें तो जल्द ही बीजेपी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, वरुण गांधी और कीर्ति आज़ाद सहित कुछ अन्य सांसद अपने भविष्य का एलान करने वाले हैं। शत्रुघ्न सिन्हा कह चुके हैं कि वे अगला चुनाव पटना से ही ज़रूर लड़ेंगे लेकिन पार्टी ज़रूरी नहीं कि बीजेपी ही हो। वैसे भी शत्रुघ्न सिन्हा पिछले काफी समय से मोदी सरकार और बीजेपी को घेरते आ रहे हैं। इसलिए ये तय माना का रहा है कि वे कभी भी बीजेपी को अलविदा कह सकते हैं।

वहीँ दूसरी तरफ बीजेपी से चल रहे सांसद कीर्ति आज़ाद और ख़ामोशी साधे बैठे वरुण गांधी को लेकर भी कुछ इसी तरह की ख़बरें हैं कि दोनो ही सांसद बीजेपी नेतृत्व से खफा हैं और ये अगला चुनाव बीजेपी के ही टिकिट पर लड़ें ये ज़रूरी नहीं।

इन सबसे अलग बीजेपी सांसदों की एक जमात वो भी है जिसे इस बात की भनक लग चुकी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी उन्हें फिर से टिकिट नहीं देगी। अकेले उत्तर प्रदेश में ऐसे सांसदों की संख्या करीब 30 से अधिक बताई जाती है। वहीँ बिहार में 05 सांसदों के टिकिट कटना तय माना जा रहा है।

ऐसी स्थति में बीजेपी को पार्टी के अंदर बड़ी बगावत का सामना भी करना पड़ सकता है। यदि वर्तमान सांसदों के टिकिट काटे गए तो ज़ाहिर है कि वे अपने लिए दूसरे दलों में स्थान तलाश करेंगे और बीजेपी को चुनाव से पहले अपने ही बागियों से भी जूझना पड़ेगा।

चुनावी वर्ष में एक साथ इतने बवंडरों से जूझना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा। यदि शिवसेना जैसे सहयोगियों ने चुनाव से पहले एनडीए छोड़ा तो पार्टी को कई मायनो में नुकसान होगा। वहीँ यदि पार्टी में किसी तरह की टूट होती है तो चुनाव से पहले उसकी भरपाई करना भी बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

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