पढ़िए, तीन तलाक पर सरकार की लीपापोती

नई दिल्ली (राजाज़ैद)। तीन तलाक पर सरकार द्वारा लाये गए बिल का गौर से अध्यन किया जाए तो मालूम होता है कि तीन तलाक पर कानून बनने के बाद भी महिलाओं की स्थति में कोई बड़ा फर्क आने वाला नहीं हैं। तीन तलाक पर सरकार ने कानून के नाम पर महज लीपापोती ही की है।

सरकार तीन तलाक पर जिस बिल को लेकर अपनी पीठ थपथपा रही है उससे महिलाओं को क्या फायदा हो रहा है। ये एक बड़ा सवाल है और सरकार के बिल में ऐसा कोई समायोजन नहीं किया गया जिससे तलाक पीड़ित महिला को आजीविका चलाने में मदद मिल सके।

सरकार कहती है कि एक बार में तीन तलाक दिए जाने पर पति को तीन साल तक की जेल का प्रावधान रखा गया है लेकिन सरकार को यह भी मालुम होना चाहिए कि 22 अगस्त 2017 को सुप्रीमकोर्ट अपने आदेश में एक बार में तीन तलाक कहने को अवैध करार दे चूका है। यानि यदि कोई पति अपनी पत्नी को एक बार में तलाक तलाक तलाक बोलकर तलाक देता है तब भी तलाक नहीं होगा। जिस परम्परा को सुप्रीमकोर्ट अवैध बता चूका है उसके लिए कानून बनाने की आवश्यकता क्या है ?

यदि सरकार आज भी मानती है कि तीन बार तलाक बोलने से तलाक हो जाता है और सरकार का प्रस्तावित कानून इसे रोकने के लिए बनाया गया है तो फिर सुप्रीमकोर्ट के उस आदेश को सरकार क्या मानती है जिसमे कहा गया है कि तीन बार तलाक बोलने को अवैध बताया गया है और एक बार में तीन तलाक कहने से तलाक नहीं माना जाएगा।

जब तीन बार तलाक बोलने से तलाक हुआ ही नहीं तो पति को जेल क्यों भेजा जायेगा ? और रही बात शरीयतन तलाक देने की तो उसके लिए हर तलाक में एक समय मुकर्रर किया गया है, यानि कि पति पत्नी इस तय समय के अंदर सुलह भी कर सकते हैं।

जमात ए इस्लामी हिन्द के महासचिव मुहम्मद सलीम इंजीनियर ने एक बयान में कहा, ‘‘यह विधेयक न सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 25 के खिलाफ है, बल्कि तीन तलाक के मामले पर आए उच्चतम न्यायालय के आदेश के भी खिलाफ है।’’

बता दें कि लोकसभा में बीते गुरुवार को ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम-2017’ को पारित किया और अब इसे राज्यसभा में पेश किया जाना है। इससे पहले 22 अगस्त को उच्चतम न्यायालय ने तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक और गैरकानूनी करार दिया था। फैसले के बाद सरकार ने कानून की जरूरत नहीं होने का संकेत दिया था, लेकिन तीन तलाक के मामलों का सिलसिला जारी रहने के बाद कानून बनाने का निर्णय हुआ।

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