जब ट्रोलर्स के सामने असहाय हो गयीं मंत्रीजी, तो आम यूजर्स कितना झेलते होंगे ?

नई दिल्ली। एक हिन्दू मुस्लिम दम्पति के पासपोर्ट मामले में ट्विटर पर मान, मर्यादा और शिष्टाचार की जो धज्जियाँ उड़ीं वो अब किसी से छिपी नहीं हैं। यदि ट्रोलर्स एक केंद्रीय मंत्री को नहीं बक्श रहे तो आम यूजर्स को कितना झेलना पड़ता होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ ट्रोलर्स ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि मामला सिर्फ आलोचना या कटाक्ष करने का नहीं था बल्कि जानबूझ कर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया गया जो किसी के आत्मसमान को ठेस पहुंचा सकती है।

किसी मुद्दे पर नीतिगत विरोध तभी तक तर्कसंगत लगता है जब तक उस मुद्दे पर तर्कसंगत आलोचना हो और तर्कसंगत जबाव दिए जाएँ। लेकिन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ ऐसा नहीं हुआ। ट्रोलर्स ने न तो मुद्दे पर तर्कसंगत कमेंट किये और न मुद्दे को पूरी तरह समझने की कोशिश की। अंततः सुषमा स्वराज को कुछ ट्रोलर्स को ब्लॉक करना पड़ा।

एक केंद्रीय मंत्री के साथ जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया वह बेहद निंदनीय तो है ही, साथ ही यह सोचने पर मजबूर ज़रूर करता है कि आखिर ये ट्रोलर्स कहाँ से आते हैं और कौन लोग हैं जिनकी मानसिकता इतनी घिनौनी है जो सुषमा स्वराज के पति तक पहुँच गए और उन्हें अपनी पत्नी (सुषमा स्वराज) की पिटाई करने की सलाह दे रहे हैं।

ट्रोलर्स का मामला यहीं समाप्त नहीं होता। कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी को तो उनकी बेटी से रेप करने तक की धमकी दी गयी। सोचने वाली बात है कि एक ट्रोलर कितनी हिम्मत रखता है कि वह सरेआम एक महिला को, जो कि आम महिला नहीं है बल्कि कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता है, उसकी बेटी से रेप की धमकी दे रहा है।

देखने में आया है कि जैसे जैसे राजनैतिक दलों के आईटी सेल के कार्यकर्त्ता सोशल मीडिया पर सक्रीय हुए हैं वैसे वैसे ट्विटर और फेसबुक असामाजिक तत्वों का अड्डा बनते जा रहे हैं।

राजनैतिक दलों के आईटी सेल के कार्यकर्त्ता होने के नाम पर फ़र्ज़ी फोटो, वीडियो, ऑडियो यहाँ तक कि किसी भी अख़बार या न्यूज़ चैनल के नाम से फ़र्ज़ी न्यूज़ भी शेयर की जा रही हैं।

राजनैतिक दलों की आपस की कलह कई बार सोशल मीडिया पर धार्मिक और जातिगत कलह पैदा कर रही है। इस काम में कई यूजर्स बाकायदा धर्म और जाति विशेष को निशाना बनाते रहते हैं।

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