छत्तीसगढ़ जैसे भी हो सकते हैं यूपी के लोकसभा चुनाव परिणाम

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में बने सपा बसपा गठबंधन को लेकर जहाँ बीजेपी प्रसन्न हैं वहीँ अब गठबंधन के नेताओं को एक बड़ी चिंता सता रही है। यह चिंता छत्तीसगढ़ में आये विधानसभा चुनावो के नतीजों को लेकर है।

आइये अब आपको समझाते हैं कि उत्तर प्रदेश में बने सपा बसपा गठबंधन को दोधारी तलवार क्यों कहा जा रहा है ? उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण बेहद मायने रखते हैं।

उत्तर प्रदेश में करीब 25 फीसदी मतदाता दलित समुदाय के हैं। वहीँ पिछड़ी जाति के मतदाताओं की तादाद करीब 35 फीसदी है। जिसमें 13 फीसदी यादव, 12 फीसदी कुर्मी और 10 फीसदी अन्य जातियों के लोग आते हैं। वहीँ उच्चजाति के मतदाताओं की संख्या करीब 16 फीसदी है। जिसमे ब्राह्मणों 8 फीसदी, ठाकुर 5 फीसदी तथा अन्य अगड़ी जाति के मतदाताओं की तादाद करीब 3 फीसदी है। इसके अलावा मुस्लिम मतदाताओं की तादाद18 फीसदी और जाट मतदाताओं की तादाद 5फीसदी है।

चुनाव विश्लेषकों की माने तो सपा बसपा गठबंधन दलित, यादव और मुस्लिम मतदाताओं को दोधारी तलवार मानकर चल रहा है। दलित, यादव और मुस्लिम मतदाताओं की तादाद मिलाकर लगभग 56% हो जाती है। सपा बसपा गठबंधन के पीछे अहम सोच यही है कि यदि दलित, यादव और मुस्लिम मतदाताओं ने गठबंधन को वोट दिया तो कम से कम गठबंधन के खाते में 50 सीटें तक आ सकती हैं।

चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि उच्च जाति का आधे से अधिक वोट भारतीय जनता पार्टी को जाना तय है। वहीँ कम से कम चौथाई दलित मतदाता बीजेपी और कांग्रेस में बंट जाएंगे। यही हाल ओबीसी मतदाताओं का भी रहेगा। यादव मतदाताओं के अलावा शेष रहे 22 फीसदी पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में से बड़ी तादाद में बीजेपी के साथ जाना तय है।

इसके अलावा शेष रहे 18% मुस्लिम मतदाताओं पर बड़ा दारोमदार है। जो सपा बसपा गठबंधन के अलावा अच्छी तादाद में कांग्रेस को भी जाएंगे। वहीँ दूसरी तरफ शिवपाल सिंह यादव की पार्टी भी समाजवादी पार्टी के परंपरागत यादव-मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाएगी।

विश्लेषकों के मुताबिक यदि कांग्रेस ने कभी अपने परम्परागत कहे जाने वाले अगड़ी जातियों और दलित मतदाताओं का कुछ हिस्सा अपनी तरफ खींच लिया तो राज्य का पूरा चुनावी समीकरण गड़बड़ा सकता है और राज्य में छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव जैसे परिणाम आ सकते हैं।

विश्लेषकों की माने तो सपा बसपा गठबंधन एक ऐसी दोधारी तलवार है जिससे यदि गठबंधन को फायदा हो सकता है तो बड़ा नुकसान भी हो सकता है।

पिछले लोकसभा चुनावो में बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों को बड़ी तादाद में उम्मीदवार बनाया था। बसपा की सोच थी कि दलित मुस्लिम कॉम्बिनेशन (25%+18%=43%) पर वह कम से कम 20 सीटें जीत सकती है। इस सब के बावजूद राज्य में बसपा का खाता तक नहीं खुला।

विश्लेषकों की माने तो यदि 5 फीसदी दलित, 5फीसदी यादव और 50 फीसदी मुस्लिम मतदाता गठबंधन से अलग चले गए तो इसका फायदा कांग्रेस को अवश्य होगा लेकिन प्रदेश में सबसे अधिक सीटें बीजेपी की आएँगी।

छत्तीसगढ़ का उदाहरण देखें तो राज्य में बहुजन समाज पार्टी और अजीत जोगी की जनता कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था। इस गठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया था। शुरुआत में ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि अजीत जोगी और मायवती का गठबंधन राज्य में कम से कम 20 सीटें तक जीत सकता है और वह किंग मेकर की भूमिका में होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इसकी अहम वजह थी कि गठबंधन के दलित-आदिवासी वोट बैंक में कांग्रेस ने सेंधमारी कर उसे अपने साथ मिला लिया। जिससे गठबंधन असफल साबित हो गया।

चुनाव विश्लषको का कहना है कि यदि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी तादाद कांग्रेस के साथ जाती है तो भी वह कांग्रेस को बड़ा फायदा जब तक नहीं होगा जबतक कि वह दलित, ओबीसी और अगड़ी जातियों के मतदाताओं में बड़ी सेंध नहीं लगाती। इसलिए यह नही माना जा सकता कि सपा-बसपा गठबंधन बनना ही जीत की पक्की गारंटी हैं।

चुनाव विश्लेषकों के मुताबिक यदि बसपा ने अपना टिकिट वितरण अगड़ी जाति के उम्मीदवारों को ज़्यादा टिकिट दिए तो निश्चित तौर पर बीजेपी को बड़ा नुकसान हो सकता है। इसकी अहम् वजह सपा बसपा गठबंधन में अगड़ी जाति के मतदाताओं का जुड़ना है जो कि अनुमान से अतिरिक्त होगा।

वहीं यदि बसपा और सपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव के पैटर्न पर टिकिट वितरण किया तो उसका फायदा बीजेपी को होगा। वहीँ कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। इसलिए कांग्रेस जितनी अधिक मेहनत करेगी उसके मतों में बढ़ोत्तरी ही होगी। यह अलग बात है कि वह सीटें उतनी न जीत पाए लेकिन कई सीटों पर सपा बसपा गठबंधन को बड़ा डेंट ज़रूर देगी।

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