गुजरात की तरह राजस्थान चुनाव में भी किसान और युवा निभा सकते हैं बड़ी भूमिका, ये है कारण

नई दिल्ली। अगले वर्ष राजस्थान में होने जा रहे विधानसभा चुनावो का नज़ारा बहुत हद तक गुजरात जैसा होने की सम्भावना है। हालाँकि राजस्थान में गुजरात की तरह कोई हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी नहीं होंगे लेकिन इसके बावजूद चुनावी मुद्दे ठीक गुजरात जैसे ही होंगे।

राजस्थान में मूलतः तीन बड़े मुद्दे हैं। पहला बेरोज़गारी, किसानो की सरकार से नाराज़गी और राज्य में बढ़ती साम्प्रदायिकता। यहाँ बीजेपी के लिए एक बड़ी मुश्किल संगठन के अंदर गुटबंदी भी है। वसुंधरा राजे सरकार में शामिल कई मंत्री ही सरकार के कामकाज से खुश नही हैं। पूर्व मंत्री घनश्याम तिवाड़ी ने तो नई पार्टी तक बनाने का एलान कर दिया है।

गुटबंदी के मामले में हालाँकि कांग्रेस भी पीछे नहीं है। राज्य में कांग्रेस भी तीन खेमो में बंटी हुई है। पहला खेमा पूर्व सीएम अशोक गहलोत का है, वहीँ दूसरा खेमा सीपी जोशी का है और तीसरा खेमा युवा नेता और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भरोसेमंद सचिन पायलट का बताया जाता है।

राजस्थान में सबसे बड़ा मुद्दा बेरोज़गारी का है। 2013 में बीजेपी मैनिफेस्टो में 15 लाख रोजगार का वादा किया था लेकिन 04 वर्षो के अभी तक के कार्यकाल में कुछ हज़ार भर्तियां ही हुई हैं। 4 साल बाद अब आलम ये है कि कौशल विकास आंकड़ों को ही रोजगारों की संज्ञा देने की कोशिशें हैं।

राजस्थान में दूसरा बड़ा मुद्दा किसानो की समस्याओं को लेकर है। किसानो पर कर्ज़े का बोझ और नया कर्ज न मिल पाने के अलावा खाद और बीज का समय पर न मिल पाना अपने आप में एक बड़ा मामला है।

राज्य में तीसरा बड़ा मुद्दा बढ़ती साम्प्रदायिकता है। वर्ष 2014 के बाद से राजस्थान में लगातार सांप्रदायिक घटनाओं में बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। गौरक्षा के नाम पर मुस्लिमो पर हमले के चलते राजस्थान का नाम कई बार सुर्ख़ियों में आता रहा है।

जानकारों की माने तो गुजरात की तरह ही राजस्थान में भी भारतीय जनता पार्टी के पास सरकार की उपलब्धियां गिनाने के नाम पर कुछ खास नहीं है। इसलिए समझा जाता है कि वह अपने कट्टर हिंदुत्व के एजेंडे के सहारे चुनावी नैया पार करने की कोशिश करेगी।

वहीँ केंद्र और राज्य दोनो जगह बीजेपी की सरकार होने के कारण बीजेपी यह कहने की स्थति में भी नहीं है कि उसे राज्य के विकास से जुड़े कामो को करने में केंद्र से मदद नहीं मिली।

कांग्रेस के लिये एक पॉजिटिव कारण है यह भी है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने गाँवों और दूर दर्ज के इलाको तक स्वयं अपनी पहुँच बनायीं है। उन्होंने गाँव गाँव जाकर लोगों को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश की है जिसके सकारात्मक परिणाम चुनावो में देखने को मिल सकते हैं।

हालाँकि यह भी कहा जाता है कि राजस्थान की जनता हर 5 वर्ष में सत्ता परिवर्तन चाहती है। यहाँ 1993 के बाद से एक बार बीजेपी तो एक बार कांग्रेस की सत्ता रहने के प्रमाण हैं। 1993: बीजेपी, 1998: कांग्रेस, 2003: बीजेपी, 2008: कांग्रेस, 2013: बीजेपी

इतना ही नहीं 2009 में राजस्थान से कांग्रेस के 20 सांसद होने के बावजूद 2014 के लोकसभा चुनाव में यहाँ सभी 25 लोकसभा सीटों पर बीजेपी ने अपना कब्ज़ा जमाया था।

हालाँकि अभी राजस्थान चुनाव में करीब 11 महीने का समय बाकी है लेकिन यह तय माना जा रहा है कि राज्य में ज़बरदस्त सरकार विरोधी हवा है। ग्रामीण इलाको में बीजेपी की लोकप्रियता में कमी आयी है। बेरोज़गारी के चलते युवा नाराज़ हैं।

बीजेपी के लिए बड़ी मुश्किल यह भी है कि गुजरात पीएम मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का गृह राज्य होने के बावजूद वहां उसे जीतने के लिए कड़ी मशक्क्त करनी पड़ी। ऐसे हालत में राजस्थान में वह कौन सा मुद्दा लेकर जनता के बीच जाए।

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