गहराई से: राम मंदिर पर सरकार चल सकती है सिर्फ ये दो कदम

नई दिल्ली(राजाज़ैद)। संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा मोदी सरकार को कानून बनाकर राम मंदिर निर्माण की हिदायत दिए जाने के बाद कई ऐसे अनसुलझे सवाल पैदा हो गए हैं जिनके जबाव अभी सरकार से जुड़े लोगों के पास नहीं हैं।

मोहन भागवत के बयान से दो नए सवाल पैदा हुए हैं। इस देश में संविधान बढ़ा है या धार्मिक भावनाएं ? क्या न्याय के लिए अदालतों के फैसलों का इंतज़ार नहीं करना चाहिए ?

अहम सवाल यही है कि क्या राम मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाया जा सकता है ? यदि हाँ तो सरकार इसके लिए क्या कदम उठा सकती है ? 2019 के चुनावो से पहले राम मंदिर मुद्दे को एक बार चर्चा में लाने के पीछे बीजेपी और संघ कितने गंभीर हैं ये आने वाले समय में पता चलेगा लेकिन बड़ा सवाल है कि केंद्र में मोदी सरकार के चार साल बीत जाने के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत को क्यों समझ आया कि कानून बनाकर राम मंदिर का निर्माण कराया जाना चाहिए।

कानून बनाकर राम मंदिर निर्माण को लेकर कानून के जानकारों की अलग अलग राय हैं। कानून के जानकारों का कहना है कि कानून बनाकर राम मंदिर निर्माण का अर्थ सिर्फ इतना ही है कि सरकार विवादित भूमि का अधिकग्रहण कर उसे उत्तर प्रदेश सरकार को हस्तांतरित कर सकती है।

जानकारों के मुताबिक यदि सरकार कोर्ट का फैसला आने से पहले चाहे तो विवादित भूमि का अधिग्रहण कर सकती है और अधिग्रहण करने के लिए अध्यादेश ला सकती है। लेकिन इस अध्यादेश की केबिनेट और संसद में मंजूरी लेनी होगी।

कानून के कुछ जानकारों की राय थोड़ी अलग है। उनका कहना है कि राम मंदिर कोई ऐसा मामला नहीं है जिस पर तुरंत कानून बनाकर काम करने की विवशता हो। जब मामला विवादास्पद ज़मींन के मालिकाना हक का मामला सुप्रीमकोर्ट में विचाराधीन है तो सरकार यदि एक पक्षीय कार्रवाही करते हुए भूमि अधिग्रहण के लिए कोई कानून लाती है तो उसे चुनौती दी जा सकती है।

इसके पीछे अहम वजह बाबरी मस्जिद के वे पक्षकार हैं, जो वर्षो से इस मामले को कोर्ट में लड़ते आ रहे हैं। सरकार किसी विवादित ज़मीन का अधिग्रहण तो कर सकती हैं लेकिन क्या उस ज़मीन पर राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समुदाय विशेष को सौंप सकती है ? ये दोनों अलग अलग बातें हैं।

जहाँ तक सरकार का प्रश्न है तो जब सरकार शब्द का इस्तेमाल होता है तो उसके लिए दोनों समुदाय बराबर की हैसियत रखते हैं। दो समुदायों के बीच की लड़ाई खत्म करने के लिए सरकार ज़मीन का अधिग्रहण तो कर सकती है लेकिन वह ज़मीन किसी एक समुदाय को नहीं दी जा सकती।

कानून के जानकारों के मुताबिक यदि सरकार सुप्रीमकोर्ट में चल रहे मामले को नज़रअंदाज कर कोई कानून बनाकर ज़मीन का अधिग्रहण करती है तो यह न्यायालय के सम्मान के खिलाफ भी होगा। सरकार के ऐसे किसी कदम से सर्वोच्च अदालत की गरिमा को ठेस पहुँच सकती है। या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह माना जाएगा कि सरकार सर्वोच्च अदालत की अवमानना कर रही है।

वहीँ कानून बनाकर मंदिर बनाये जाने के भागवत के बयान को 2019 के चुनावो से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि भागवत चाहते हैं कि मतदाताओं में भरोसा पैदा करने के लिए राम मंदिर को लेकर कुछ काम छेड़ दिया जाए, भले ही वह अंजाम तक न पहुंचे लेकिन जनता की नज़रो में यह आ जाए कि राम मंदिर का निर्माण होने जा रहा है।

मोहन भागवत के बयान के उस हिस्से को ठीक से पढ़ा जाए जिसमे कहा गया है कि “लोग कहते हैं कि इनकी सत्ता है फिर भी मंदिर क्यों नहीं बना, वोटर सिर्फ एक ही दिन का राजा रहता है।” भागवत के बयान का यह हिस्सा इशारा करता है कि मतदाताओं को बीजेपी से जोड़े रखने के लिए राम मंदिर पर कुछ काम शुरू करना आवश्यक हो गया है।

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