गठबंधन पर असमंजस की स्थति में है विपक्ष, बीजेपी चाहती है तीसरा मोर्चा बने

नई दिल्ली(राजाज़ैद)। आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष के महागठबंधन को लेकर गैर बीजेपी दल असमंजस की स्थति में हैं। अहम कारण सीटों का बंटवारा और गठबंधन नेतृत्व को लेकर अलग अलग दलों की अलग अलग राय है।

इसके अलावा राज्य स्तर पर परस्पर विरोधी रहीं पार्टियों को एक मंच पर लाना सबसे बड़ी चुनौती है। पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहाँ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दल किसी हाल में एक मंच पर नहीं आ सकते। वहीँ ओडिशा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल विपक्ष के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की जगह अकेले दम पर चुनाव लड़ना चाहता है।

उत्तर प्रदेश में गठबंधन के लिए समाजवादी पार्टी की पहली पसंद बहुजन समाज पार्टी है और वह इस गठबंधन में कांग्रेस को किनारे पर रखना चाहती है। देश के अहम राज्यों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशो में कई पेंच फंसे हैं।

क्षेत्रीय पार्टियां इस बात पर एकजुट हैं कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत हैं वहां कांग्रेस ड्राइवर बनने की कोशिश न करके पिछली सीट पर बैठकर सवारी करे। उत्तर प्रदेश में सपा बसपा, बिहार में राजद, तमिलनाडु में डीएमके, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस चाहते हैं कि कांग्रेस इन राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों को आगे रखकर चले और उन्हें अधिक सीटों पर लड़ने का मौका दे।

वहीँ दूसरी तरफ सपा पिछले चुनाव में प्रदर्शन के आधार पर सीटों का बंटवारा चाहती है। पार्टी सूत्रों के अनुसार सपा ने जो फॉर्मूला सुझाया है उसके अनुसार पिछले आम चुनावो में जहाँ जिस पार्टी का उम्मीदवार जीता है या दूसरे नंबर पर रहा है वह सीट उस पार्टी को दे दी जाए।

इस हिसाब से देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ 8 सीटें ही हिस्से में आएँगी। इनमे सहारनपुर, गाज़ियाबाद, लखनऊ, रायबरेली, अमेठी, कानपुर, बाराबंकी, कुशीनगर आदि शामिल हैं।

वहीँ यदि सपा का फॉर्मूला मान लिया जाए तो सपा के हिस्से में 36 सीटें आएँगी, इनमे आज़मगढ़, कन्नौज, बदायूं, फ़िरोज़ाबाद सीटें शामिल हैं। सपा के फॉर्मूले के हिसाब से बसपा के हिस्से में भी 36 सीटें आएँगी। सपा के फॉर्मूले के हिसाब से सपा को 36, बसपा को 36 और कांग्रेस को 8 सीटें मिलेंगी।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार पार्टी उत्तर प्रदेश में कम से कम 20 सीटें चाहती हैं तथा ऐसा न होने पर पार्टी चौधरी अजीत सिंह की रालोद से हाथ मिलाकर अलग चुनाव लड़ने के विकल्प पर भी विचार कर सकती है।

फिलहाल सभी की नज़रें बसपा सुप्रीमो मायावती पर टिकी हैं। जानकारों की माने तो गठबंधन को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती का कोई भी निर्णय कांग्रेस और सपा को बड़े स्तर पर प्रभावित कर सकता है। यदि बसपा सुप्रीमो सपा की जगह कांग्रेस के साथ राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन करती हैं तो कई राज्यों में चुनावी तस्वीर बदल सकती है।

उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी राजद की तरफ से अब कांग्रेस को पिछली सीट पर सवारी करने की सलाह दी गयी है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने हाल ही में कहा कि कांग्रेस को चाहिए कि वह क्षेत्रीय पार्टियों को आगे रखकर उनकी बड़ी भूमिका सुनिश्चित करे।

तेजस्वी यादव ने यह भी कहा कि यदि संविधान बचाना है तो विपक्ष की एकता बेहद ज़रूरी है। ऐसे में कांग्रेस की भूमिका बेहद अहम है। कांग्रेस पर निर्भर करेगा कि वह क्षेत्रीय दलों के साथ किस तरह गठबंधन को तय करेगी।

विपक्ष के बीच 2019 को लेकर गठबंधन की चर्चाओं के बीच तीसरा मोर्चा बनाये जाने की अटकलें भी चल रही हैं। बीजेपी चाहती है कि देश में एक तीसरा मोर्चा बने। जिससे सेकुलर मतों के विभाजन के सहारे वह फिर से केंद्र की सत्ता हासिल करे।

हालाँकि अभी आम चुनावो में समय बाकी है और कहा जा रहा है कि इस वर्ष राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने जा रहे विधानसभा चुनावो के परिणामो पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। इन राज्यों के चुनावो को 2019 का सेमीफाइनल कहा जा रहा है। यदि इन राज्यों में कांग्रेस अपने दम पर बीजेपी का किला ध्वस्त करने में कामयाब रहती है तो 2019 के गठबंधन के लिए वह क्षेत्रीय पार्टियों से मोल भाव कर सकती है। लेकिन यदि विधानसभा चुनावो में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता तो निसंदेह 2019 के चुनाव के लिए उसे क्षेत्रीय पार्टियों से उनकी शर्तों पर हाथ मिलाना पड़ेगा

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