क्या 2019 से पहले वरुण गांधी त्याग देंगे सांप्रदायिक चोला?

ब्यूरो (तौसीफ कुरैशी, लखनऊ) । आज कल राजनीति में आया राम ,गया राम वाली रणनीति पर अमल किया जा रहा है क्योंकि अब हर पल देश आमचुनाव की ओर बढ़ रहा है जैसे-जैसे यह पल बढ़ते जाएँगे वैसे-वैसे ही सियासत करने वालों के सियासी घर भी बदलेंगे कोई साम्प्रदायिक चौला उतारकर सेकुलर होने का चौला पहनेगा तो कोई सेकुलर चौला उतारकर साम्प्रदायिक चौला पहनेगा।

चुनावी दुंदुभी बजने वाली है या यूँ भी कह सकते है कि बज चुकी है गाँव गली मोहल्ले चौराहों पर बहसों का सिलसिला शुरू हो गया है उसी को ध्यान में रखते हुए नेताओं ने अपना जाल बिछाना शुरू कर दिया है। इसी जाल में एक ऐसा नाम सामने आया है जिसके बाद बहुत हद तक कहा जा सकता है कि यूपी की सियासत में फ़र्क़ पड़ेगा।

आजादी से पूर्व के आन्दोलनों में भागीदार रहे व बाद में भी देश की सियासत में अग्रणी भूमिका में रहे गांधी परिवार से ताल्लुक़ रखने वाले मोदी की भाजपा से सुल्तानपुर लोकसभा सीट से सांसद वरूण गांधी की अपने मूल घर में वापसी होगी ऐसी ख़बरें यूपी की सियासत में तैर रही है सूत्रों का दावा है सबकुछ तय हो गया है सुल्तानपुर लोकसभा सीट से वरूण गांधी कांग्रेस के प्रत्याशी होगे ?

इन दिनों राजनीतिक गलियारो में यह चर्चा आम है कि भाजपा नेता वरुण गांधी मोदी की भाजपा से खिन्न होकर अपने घर जाने की तैयारी में है। हमारे सूत्रों को मिली जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि दिसंबर तक वरुण गांधी मोदी की भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं।? हांलाकि अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन माँ मेनका गांधी का यह कहना कि मुझे कोई ऐतराज़ नही है वरूण गांधी के कांग्रेस में जाने से इस ख़बर की पुष्टी तो नही करता परन्तु मज़बूती ज़रूर देती है।

यह बात भी तय है कि वरुण गांधी इन दिनों भारतीय जनता पार्टी में हाशिए पर बने हुए हैं।ऐसे में लोकसभा चुनाव-2019 नजदीक आते ही इस बात की चर्चा होने लगी है कि वरुण गांधी कांग्रेस में शामिल हो जाएंगे।मोदी की भाजपा में भाजपा सांसद वरुण गांधी के पास संगठन से जुड़ा कोई पद भी नहीं है।

इतना ही नहीं अब वह बंगाल के प्रभारी भी नहीं रहे।वरुण गांधी की मां मेनका गांधी का यह मानना है कि यदि वह कांग्रेस ज्वाइन करते हैं, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस में वरुण गांधी को प्रधान महासचिव का पद दिया जा सकता है।मतलब साफ है, पार्टी में उनकी हैसियत कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बाद की होगी।

चर्चा है कि कांग्रेस में एंट्री लेने के बाद वरुण गांधी को यूपी का प्रभारी और पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया जा सकता है।इस पारिवारिक मिलन में अगर किसी ने भूमिका निभाई है तो वह है प्रियंका गांधी जिसे इन्दिरा गांधी की परछाईं भी कहा जाता है उन्होंने ही परिवार में पिछले काफ़ी दिनों से चली आ रही दूरियों को मिटाकर एकजुट होने के संदेश देने पर ज़ोर दिया है।

सूत्रों के अनुसार तीनों भाई बहनों में वैसे ही बहुत प्यार था कभी एक दूसरे के प्रति कोई टिका टिप्पणी नही की लेकिन आज कल मिल बैठकर खट्टी-मिठ्ठी चर्चा करने की ख़बरें मिल रही है।

राजनीतिक विश्लेषको का मानना है कि इसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है जैसी कांग्रेस की रणनीति है कि वरूण गांधी को प्रधान महासचिव बनाकर पूरी तरीक़े से यूपी में भेज देना है इन दिनों यूपी में सपा के पारिवारिक वर्चस्व को लेकर मचे घमासान से जो जगह मिलती दिख रही है उससे इंकार नही किया जा सकता है।

जो वोटबैंक आज सपा के पास है कभी वह कांग्रेस के पास हुआ करता था क्योंकि यादव कंपनी राजनीतिक जीवन के सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है पारिवारिक झगड़े से निपटना बहुत आसान नही होता दूसरी तरफ़ साम्प्रदायिक ताकते लगातार हमलावर हो रही है उसमें अगर वरूण गांधी ने सही तरह से सियासी पेंच बंदी कर दी तो हो सकता है कि कांग्रेस निचले पायदान से उठकर पहले पर या पहले के क़रीब आ जाए।

यहाँ यह सवाल भी ज़रूरी है कि क्या वरूण गांधी के द्वारा जो साम्प्रदायिक चौला पहन रखा था वह कांग्रेस को नुक़सान तो नही देगा ? अब यह तो आने वाले दिनों में तय होगा जब वरूण गांधी कांग्रेस में प्रवेश करेगे नुक़सान होगा या फ़ायदा ? लेकिन इतना ज़रूर कह सकते है कि इन्दिरा गांधी की परछाईं प्रियंका गांधी की परिवार को एक करने की मेहनत रंग ला सकती है?


उपरोक्त लेख लेखक के निजी विचारो और आंकलन पर आधारित है,  लोकभारत का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है। 

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