कोरेगांव हिंसा को राहुल ने बताया “बीजेपी और आरएसएस की फासीवादी विचारधारा का प्रतीक”

नई दिल्ली। महाराष्ट्र के पुणे में 200 साल पुराने एक युद्ध की वर्षगांठ पर दलितों और मराठाओं के बीच हुए संघर्ष पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरएसएस और बीजेपी पर निशाना साधा है।

इस घटना के बाद पुणे समेत महाराष्ट्र के अन्य इलाकों में हिंसा की घटनाएं हुई है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि कोरेगांव हिंसा बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की फासीवादी विचारधारा का प्रतीक है।

उन्होंने ट्विटर पर अपने ट्वीट में लिखा कि “आरएसएस और बीजेपी की फासीवादी विचाराधारा यही चाहती है कि दलित भारतीय समजा की तलहटी में ही रहें। ऊना, रोहित बेमुला और अब भीम-कोरेगांव प्रतिरोध के प्रतीक हैं।”

इससे पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार ने इस घटना के लिए दक्षिणपंथी संगठनों की जिम्मेदार बताया और आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है।

पवार ने कहा कि भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी। हर साल यह दिन बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है लेकिन इस बार कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने यहां की फिजा को बिगाड़ दिया।

बता दें कि पुणे में 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव युद्ध के 200 साल पूरे होने पर लाखों की संख्या में दलित शौर्य दिवस मनाने इकट्ठा हुए थे। इसी दौरान भीड़ की शक्ल में सैकड़ो लोगों ने कार्यक्रम स्थल की तरफ कुछ किया। जिसके बाद हिंसक घटनाएं और आगजनी हुईं। इस घटना के बाद मुंबई में भी तनाव है और प्रशासन ने एहतियात के तौर पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है।

क्या है भीमा-कोरेगांव की लड़ाई:

200 साल पहले 1818 में पेशवा को अंग्रेजों ने दलितों के साथ मिलकर हराया था। भीमा कोरेगांव की लड़ाई 1 जनवरी 1818 को पुणे स्थित कोरेगांव में भीमा नदी के पास उत्तर-पू्र्व में हुई थी। यह लड़ाई महार और पेशवा सैनिकों के बीच लड़ी गई थी।

अंग्रेजों की तरफ 500 लड़ाके, जिनमें 450 महार सैनिक थे और पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28,000 पेशवा सैनिक थे, मात्र 500 महार सैनिकों ने पेशवा की शक्तिशाली 28 हजार मराठा फौज को हरा दिया था।

महार सैनिकों को उनकी वीरता और साहस के लिए सम्मानित किया गया और उनके सम्मान में भीमा कोरेगांव में स्मारक भी बनवाया। जिन पर महारों के नाम लिखे गए। इसके बाद से पिछले कई दशकों से भीमा कोरेगांव की इस लड़ाई का महाराष्ट्र के दलित जश्न मनाते आ रहे हैं।

हर साल नए साल के मौके पर महाराष्ट्र और अन्य जगहों से हजारों की संख्या में पुणे के परने गांव में दलित पहुंचते हैं। यहीं वो जयस्तंभ स्थित है जिसे अंग्रेजों ने उन सैनिकों की याद में बनवाया था। जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान गंवाई थी। कहा जाता है कि साल 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर इस मेमोरियल पर पहुंचे थे। जिसके बाद से अंबेडकर में विश्वास रखने वाले इसे प्रेरणा स्त्रोत के तौर पर देखते हैं।

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