कैराना में हवा में तीर चलाते रहे बीजेपी नेता, अब साख बचाने की लड़ाई

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की कैराना संसदीय सीट और नूरपुर विधान सभा सीट पर कल होने वाले मतदान के लिए चुनाव प्रचार 26 मई को समाप्त हो चूका है।

गन्ना बनाम जिन्ना की बात करने वाली बीजेपी के लिए परेशानी की खबर यह है कि बागपत जिले की बड़ौत तहसील में गन्ना के बकाये के भुगतान की मांग को लेकर धरना दे रहे किसानो में से एक किसान की धरना स्थल पर ही मौत हो गयी है। जिसके बाद किसानो का गुस्सा फूट पड़ा है।

बीजेपी ने अपनी रणनीति के तहत अंतिम समय पर हवा चलाने के प्रयास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 27 मई (आज) को बागपत में कार्यक्रम रखा था लेकिन इसके ठीक एक दिन पूर्व किसान की मौत से कैराना के किसानो में अब उलटी हवा बहना शुरू हो गयी है।

वहीँ कैराना और नूरपुर में बीजेपी के लिए अब साख बचाने की लड़ाई ही शेष बची है। विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार के चलते कैराना और नूरपुर में सियासी समीकरण पूरी तरह बीजेपी के खिलाफ बन चुके हैं।

बिगड़े सियासी समीकरणों के चलते पूरे प्रचार के दौरान बीजेपी नेता यह तय नहीं कर पाए कि उन्हें ये चुनाव आखिर किस मुद्दे पर लड़ना है। इसलिए चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी नेता हवा में तीर चलाते दिखे। बीजेपी नेताओं ने प्रचार में कभी जिन्ना की बात तो कभी गन्ना किसानो की, लेकिन पूरे प्रचार के दौरान बीजेपी नेताओं को किसी भी सभा में प्रदेश की मोदी सरकार की या केंद्र की मोदी सरकार की उपलब्धियों का ज़िक्र करते नहीं सुना गया।

क्या है सियासी समीकरण :

पांच विधानसभाओं वाले कैराना में मुस्लिम मतदाताओं और जाट मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। पिछले चुनाव में सपा, बसपा ने अलग अलग चुनाव लड़ा था जिसके चलते मुसलिम और जाट मतों के विभाजन का बीजेपी को फायदा मिला था। लेकिन इस बार स्थति पहले से बिलकुल अलग है।

इस बार बीजेपी का मुकाबला संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार से है। कैराना में जातिगत आंकड़ों को देखा जाए तो इस बार सियासी समीकरण पूरी तरह बीजेपी के खिलाफ है। करीब 16 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर करीब साढ़े पांच लाख मुसलमान वोट हैं। जबकि 1.8 लाख जाट मतदाता हैं और करीब ढाई लाख दलित मतदाता हैं। जबकि गूजर और कश्यप मतदाता डेढ़-डेढ़ लाख हैं।

जानकारों की माने तो 2014 की तरह इस बार जाट मतदाता एकतरफा बीजेपी को वोट नहीं करेंगे। जाट किसानो में गन्ना के बकाये के भुगतान न होने को लेकर नाराज़गी के चलते इस बार जाट मतदाताओं का बड़ी तादाद में रालोद उम्मीदवार की तरफ झुकाव देखा गया है। ऐसे में पांच लाख मुस्लिम मदताओं के वोटों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

चूँकि रालोद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहीं तबस्सुम हसन स्वयं मुस्लिम समुदाय से आती हैं तथा चुनाव में कोई अन्य मुस्लिम उम्मीदवार नहीं है। ऐसे में रालोद उम्मीदवार को बड़ी तादाद में मुस्लिम मत मिलते दिखाई दे रहे हैं जो उसकी जीत का आधार बन सकते हैं। वहीँ यदि जाट मतदाताओं ने भी बीजेपी के खिलाफ अपनी नाराज़गी को वैलेट में बदला तो बीजेपी के लिए साख बचाना भी भारी होगा।

वहीँ इस बार रालोद उम्मीदवार को बहुजन समाज पार्टी का भी समर्थन प्राप्त है। ऐसे में ढाई लाख दलित मतदाता रालोद उम्मीदवार को बड़ी तादाद में मतदान करके बीजेपी की पराजय सुनिश्चित कर सकते हैं।

फ़िलहाल सभी की निगाहें कल होने वाले मतदान पर टिकी हैं। जानकारों की माने तो जितनी अधिक तादाद में मतदान होगा उतने अधिक मतों से जीत हार तय होगी।

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