कर्नाटक के बाद कैराना में अटकी हैं बीजेपी की साँसे

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव के लिए 28 मई को मतदान होगा। यह सीट 2014 में बीजेपी ने जीती थी। यहाँ से सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद यह सीट खाली हुई है। बीजेपी ने इस सीट पर हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को उम्मीदवार बनाया है। वहीँ सपा, बसपा और कांग्रेस के समर्थन से राष्ट्रीय लोकदल ने इस सीट पर तबस्सुम हसन को उम्मीदवार बनाया है।

कैराना सीट को लेकर बीजेपी की प्रतिष्ठा दांव पर है। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटों गोरखपुर और फूलपुर में हुए उपचुनाव में बीजेपी को पराजय का सामना करना पड़ा था। इसलिए बीजेपी कैराना को लेकर काफी उम्मीदें संजोये बैठी है।

कैराना में मतदान के लिए अब मात्र पांच दिन शेष बचे हैं। ऐसे में राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झौंक रखी है। यहाँ बीजेपी के कई पूर्व मंत्रियों के अलावा बीजेपी सांसद और आसपास के इलाको के बीजेपी विधायकों ने डेरा जमा रखा है।

वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम हसन के समर्थन में राष्ट्रीय लोकदल के अलावा समाजवादी पार्टी के नेता भी प्रचार में जुटे हैं। लेकिन अभी तक बहुजन समाज पार्टी या कांग्रेस का कोई बड़ा नेता यहाँ प्रचार करने नहीं आया है। वहीँ अब कांग्रेस,सपा और बसपा के समर्थन के बाद आम आदमी पार्टी ने भी विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम हसन के समर्थन का एलान किया है।

जानकारों की माने तो कैराना लोकसभा क्षेत्र में यादव मतदाताओं की संख्या बेहद कम है। इसलिए इस इलाके समाजवादी पार्टी के प्रचार करने से बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा। वहीँ कैराना लोकसभा सीट पर दलित, जाट और मुस्लिम मतदाताओं को गेम चेंजर माना जाता रहा है।

जानकारों के अनुसार कैराना में वही चुनाव जीतता है जिसके पास दो जातियों का कॉम्बिनेशन होता है। यानि या तो दलित और मुसलमान, या दलित और जाट या जाट और मुस्लिम।

स्थानीय लोगों की माने तो विपक्ष की तरफ से किये जा रहे प्रचार में अभी तक वह धार दिखाई नही दे रही जो फूलपुर और गोरखपुर में हुए लोकसभा उपचुनाव के दौरान दिखाई दी थी।

वहीँ राष्ट्रीय लोकदल इस सीट पर अपनी जीत को आसान मान कर चल रहा है। रालोद को मुस्लिम, जाट के अलावा बसपा का परम्परागत माना जाने वाले दलित वोट बैंक पर भरोसा है।

वहीँ रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन के पति के छोटे भाई कंवर हसन ने लोकदल से टिकिट लेकर अपनी दावेदारी की है। जानकारों की माने तो कंवर हसन के मैदान में आने से मुस्लिम मतों का विभाजन हो सकता है। जानकारों के अनुसार कंवर हसन सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं पर ही असर डाल सकते हैं लेकिन उन्हें जितने भी मुस्लिम वोट मिलेंगे उतने वोट रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन के कम होंगे। जिसका लाभ बीजेपी को मिलेगा

वहीँ स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कंवर हसन को परदे के पीछे से बीजेपी ने मैदान में उतारा है। जिससे वे रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन को एकतरफा मिलने वाले मुस्लिम मतों में सेंध लगायी जा सके।

फ़िलहाल देखना है कि बसपा की तरफ से कोई बड़ा नेता चुनाव प्रचार के लिए कैराना आता है अथवा नहीं। यदि कैराना में बसपा की तरफ से चुनाव प्रचार में सक्रियता नहीं दिखाई गयी तो बीजेपी दलित मतदाताओं में भी सेंध लगाने में कामयाब हो सकती है।

कैराना चुनाव में हार जीत का फैसला विपक्ष की एकता पर निर्भर करता है। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में सपा बसपा गठबंधन के चलते बीजेपी को करारी हार मिली थी। वहीँ अब उम्मीद जताई जा रही है कि चुनाव प्रचार के अंतिम दिन से ठीक एक दिन पहले बसपा और कांग्रेस के कद्दावर नेता कैराना में मौजूद रहेंगे।

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