चुनाव

कई राज्यों में निकाय चुनाव जीतने के बाद भी लोकसभा,विधानसभा उप चुनावो में हारी थी बीजेपी

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश निकाय चुनावो के परिणामो पर सीना फुला रही बीजेपी की चिंताएं अभी खत्म नहीं हुईं। उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावो के परिणामो को गुजरात में जीत का आधार बता रही बीजेपी का यह सुखद सपना जल्द टूटने वाला है।

जहाँ तक नगर निगमों के परिणाम का सवाल है तो बीजेपी ने महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और ओडिशा में भी अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन उसके बाद हुए कई लोकसभा और विधानसभा उप चुनावो में उसे पराजय मिली।

गुजरात में यदि यूपी के निकाय चुनावो के परिणामो का असर होता तो यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की सभाओं में कुर्सियां खाली न पड़ी रहतीं। गुजरात में इस बार बड़ा मुद्दा युवाओं की बेरोज़गारी का है। आंकड़ों की लीपापोती कर गुजरात को अव्वल बताने वाली भारतीय जनता पार्टी को धरातल की हकीकत से रूबरू होना पड़ रहा है।

रोज़गार के मामले में ज़मीनी हकीकत यही है कि राज्य में बेरोज़गारो की तादाद में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। नोट बंदी जीएसटी से काम धंधो में आयी कमी को छोड़ भी दें तब भी गुजरात में नए नए रोज़गारो का टोटा है। युवाओं के लिए नौकरियां नहीं हैं। आंकड़ों की लीपापोती से पांच साल तक गुजरात मॉडल और विकास के दावे करने वाली बीजेपी के पास चुनावी सभाओं में कई मुद्दों पर बोलने के लिए कुछ नहीं है।

यही कारण है कि राज्य में विकास कहाँ हुआ है और क्या विकास हुआ है ? ये बताने की जगह अमित शाह कहते हैं कि राहुल गांधी को इटेलियन चश्मे के कारण विकास दिखाई नहीं दे रहा। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह सहित बीजेपी नेता विकास को लेकर जो बहाने दे रहे हैं वह आम जनता के गले नहीं उतर रहा।

बीजेपी को जल्द ही यह स्वीकारना पड़ेगा कि ज़मीनी हकीकत पर उसके दावे सच साबित नहीं हो रहे। यही कारण है कि उसके परम्परागत कहे जाने वाले मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा उसके हाथ से छिटक चूका है। पाटीदारो को छोड़ भी दिया जाए तब भी आम मतदाताओं के बीच बीजेपी को लेकर मोहभंग होने जैसी स्थति है।

ज़मीनी हकीकत देखें तो कारोबारियों, दलितों, आदिवासियों और ओबीसी वर्ग के मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अब बीजेपी से दूर जा चूका है। खुद बीजेपी के स्थानीय नेताओं में भी पिछले चुनावो जैसा जोश नहीं है। ऐसे में जब गुजरात में जब हवा सरकार विरोधी चल रही है, एक बड़ा सवाल यही है कि बीजेपी जिन उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावो के परिणामो का हवाला देकर अपना सीना फुला रही है, क्या उत्तर प्रदेश के परिणामो से उसकी जीत का आधार बन पायेगा ?

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