‘ए भाई! जरा देख के चलो’ प्रख्यात गीतकार गोपालदास नीरज का निधन

नई दिल्ली। प्रख्यात गीतकार और पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित गोपाल दास नीरज का आज निधन हो गया। उन्होंने अंतिम सांस आज दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में ली। पिछले कुछ महीनो से उनका एम्स में इलाज चल रहा था। वे 93 वर्ष के थे।

दशकों तक कवि सम्मेलनों का जाना-पहचाना नाम रहे गोपालदास सक्सेना, जिन्हें गोपालदास नीरज के रूप में ज्यादा जाना गया, को हिंदी फिल्म जगत ने भी उतने ही सम्मान से अपनाया।

गोपाल दास नीरज हर पीढ़ी की पसंद रहे। कई फिल्मो को सुपरहिट गीत देने वाले गोपाल दास नीरज का जन्म 4जनवरी 1925 को हुआ था। अपने करियर की शुरुआत में गोपाल दास नीरज ने अपनी पहचान कवि सम्मेलनों से बनायीं। उन्हें गंभीर कवियों में गिना जाता था।

नीरज को मुंबई के फिल्म जगत से गीतकार के रूप में फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ के गीत लिखने का न्योता मिला। इस फिल्म के लिए उनके लिखे दो गीत – ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे…’ और ‘देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जाएगा…’ बड़े लोकप्रिय हुए।

इसके बाद तो उनके सामने फिल्मों के लिए गीत लिखने के प्रस्तावों की छड़ियां लग गयीं. फिर क्या था? वे मुंबई में रहकर फिल्मों के लिए गीत लिखने लगे। उन्होंने ‘मेरा नाम जोकर’, ‘शर्मीली’, ‘प्रेम पुजारी’ जैसी कई चर्चित फिल्मों में कई गीत लिखे, जिनका जादू दशकों बाद आज भी बरकरार है।

जिन गीतों के लिए मिले तीन फिल्म फेयर पुरस्कार :

काल का पहिया घूमे रे भइया (फिल्म : चंदा और बिजली, 1970)
बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं (फिल्म : पहचान, 1971)
ए भाई! जरा देख के चलो (फिल्म : मेरा नाम जोकर, 1972)

इन गीतों ने नीरज को बुलंदी तक पहुँचाया :

कहता है जोकर सारा जमाना, आधी हकीकत आधा फसाना…
रंगीला रे, तेरे रंग में क्यूं रंगा है मेरा मन…
शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब…
दिल आज शायर है, गम आज नगमा है, शब ये गजल है सनम…
आज मदहोश हुआ जाये रे, मेरा मन, मेरा मन…
लिखे जो खत तुझे, हजारों रंग के नजारे बन गये…
फूलों के रंग से, दिल की कलम से, तुझको लिखी रोज पाती…
मैंने कसम ली, हां मैंने कसम ली…
मेघा छाये आधी रात…
बैरन बन गयी निंदिया…
फूलों की बगिया महकेगी…

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