आसान नहीं है सवर्णो के लिए आरक्षण की राह, मोदी सरकार के लिए ये हैं मुश्किलें

नई दिल्ली(राजाज़ैद)। मोदी सरकार द्वारा अचानक सवर्णो को आर्थिक आधार पर दस फीसदी आरक्षण दिए जाने का फैसला लिया जाना आम चुनाव से पहले एक बड़ा कदम माना जा रहा है लेकिन इसे अमली जामा पहनाने में सरकार की सांस फूल सकती है।

जानकारों की माने तो सर्वणो के लिए दस फीसदी आरक्षण को लोकसभा चुनाव से पहले लागू करा पाना मोदी सरकार के लिए आसान नहीं है। इसमें कई पेंच फंसे हुए हैं जो सरकार को उलझा सकते हैं।

जानकारों के मुताबिक इस बिल को पास कराने के लिए लोकसभा और राज्य सभा में पास होने के अलावा 50% राज्य विधानसभाओं की भी सहमति चाहिए। इसके अलावा सर्वणो के लिए कुछ अन्य अड़चने भी मूँह खोले सरकार के सामने कड़ी हैं।

पहली अड़चन यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय कर रखी है और संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान नहीं है। दूसरा यह है कि संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में केवल सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े होने की बात है। वर्ष 1963 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आमतौर पर 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है।

संविधान के अनुसार, आरक्षण का पैमाना सामाजिक असमानता है और किसी की आय और संपत्ति के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 16(4) के अनुसार, आरक्षण किसी समूह को दिया जाता है और किसी व्यक्ति को नहीं। इस आधार पर पहले भी सुप्रीम कोर्ट कई बार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के फैसलों पर रोक लगा चुका है। अपने फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है।

क्या कहता है लोकसभा और राज्य सभा का अंक गणित:

संविधान संशोधन बिल पास करवाने के लिए दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। नंबर गेम के हिसाब से लोकसभा में तो सरकार नंबर ना होने बावजूद बिल पास करवा लेगी लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस, आप और बीएसपी के समर्थन के बावजूद बिल अटक सकता है।

लोकसभा में दो तिहाई बहुमत ना होने बाद भी सरकार की राह आसान है, क्योंकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने बिल को समर्थन देने की बात कही है। लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं, बिल. पास करवाने के लिए 349 वोटों की जरूरत है। एनडीए के पास लोकसभा में 303 सांसद हैं, इसमें कांग्रेस के 45 और आम आदमी पार्टी के 4 सांसदों को जोड़ दें तो ये आंकड़ा 352 पर पहुंच जाता है।

राज्यसभा में सरकार के बाद जरूरत दो तिहाई बहुमत पास करवाना थोड़ा मुश्किल है। राज्यसभा में कुल सीटें 244 हैं, बिल पास करवाने के लिए जरूरी नंबर 163 है।

राज्यसभा में एनडीए के पास 92 सीटें हैं, कांग्रेस की 50 और आप की 3 सीटें जोड़ लें तो यह नंबर सिर्फ 145 तक ही पहुंचता है। राज्यसभा में 18 सीटें कम पड़ रही हैं। बता दें कि राज्यसभा का कार्यकाल एक दिन के लिए बढ़ाया गया है।

चूँकि विपक्ष सवर्णो के लिए दस फीसदी आरक्षण के प्रस्ताव को इस वर्ष होने जा रहे आम चुनावो से जोड़कर देख रहा है। इसलिए राज्य सभा में इस बिल में कुछ संशोधन की मांग उठा सकता है।

चुनाव में बीजेपी को फायदे की जगह हो सकता है नुकसान :

बीजेपी सर्वणो के लिए जिस दस फीसदी आरक्षण के अपने दांव को गेम चेंजर मानकर चल रही है वह ज़रूरी नहीं कि उसे चुनावो फायदा ही दे। इस बिल से पार्टी को चुनावो में नुक्सान भी हो सकता है। अहम वजह है कि सवर्णो के लिए आरक्षण लागू होने से दलित और पिछड़ा वर्ग के लोग भड़क सकते हैं। हालाँकि इस बिल से पहले से चल रहे आरक्षण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

सभी सवर्णो को नहीं मिलेगा फायदा :

आर्थिक आधार पर दस फीसदी आरक्षण से सामान्य वर्ग के सभी लोग फायदा नहीं उठा सकेंगे। सवर्णो का वह मध्यम वर्ग जिसने एससी/एसटी एक्ट में संशोधन के खिलाफ विरोध जताया था वह वर्ग इस आरक्षण से ज़्यादा लाभ नहीं उठा सकेगा क्यों कि आरक्षण का लाभ लेने के लिए कुछ मानक तय किये गए हैं।

आरक्षण की क्या हैं शर्तें :

समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक, जिन लोगों की पारिवारिक आय 8 लाख रुपये सालाना से कम है उन्हें ही इसका फायदा मिलेगा। इसके साथ ही इसके लिए शहर में 1000 स्क्वेयर फीट से छोटे मकान और 5 एकड़ से कम की कृषि भूमि की होना जरूरी होगा।

इन्हें मिलेगा लाभ-

-जिसकी सलाना इनकम 8 लाख रुपए या इससे कम है

-जिसके पास 5 एकड़ या उससे कम खेती जमीन है

-जिसका 1000 वर्ग फुट से कम जमीन पर मकान है

-कस्बों में 200 गज जमीन वालों को, शहरों में 100 गज जमीन वालों को

-राजपूत, भूमिहार, बनिया, जाट, गुर्जर को इस श्रेणी में आरक्षण मिलेगा

-आरक्षण शिक्षा (सरकार या प्राइवेट), सार्वजनिक रोजगार में इसका लाभ मिलेगा

-आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा जिन्हें अभी आरक्षण का फायदा नहीं मिल रहा है

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