असम फेक एनकाउंटर मामले में मेजर जनरल, दो कर्नल सहित सात सैनिकों को उम्रकैद

नई दिल्ली। असम के एक फर्जी मुठभेड़ मामले में सैन्य अदालत ने शनिवार को एतिहासिक फैसले में एक मेजर जनरल, दो कर्नल समेत सात सैनिकों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। 24 साल पुरानी इस मुठभेड़ में सेना ने ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के 5 सदस्यों को मार गिराया था।

समाचार एजेंसी आइएनएस के मुताबिक, सेना के कोर्टमार्शल में तिनसुकिया जिले में 24 वर्ष पुराने फर्जी मुठभेड़ पर फैसला आया है। उल्फा आतंकवादियों द्वारा चाय बागान के एक महाप्रबंधक की हत्या के बाद 18 पंजाब रेजिमेंट ने तिनसुकिया जिले के अलग अलग इलाकों से 17 से 19 फरवरी 1994 के बीच ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) के नौ सदस्यों को उठाया था।

इसके बाद 23 फरवरी को दंगारी फर्जी मुठभेड़ में एएएसयू के पांच कार्यकर्ता प्रबीन सोनोवाल, प्रदीप दत्ता, देबाजीत बिस्वास, अखिल सोनोवाल और भाबेन मोरान की हत्या की गई थी। सेना ने इनके शवों को ढोला थाने में पेश किया था जिन्हें लेने से पुलिस ने इनकार कर दिया था। इसके कुछ दिनों बाद ये शव पास के इलाके से बरामद किए गए थे।

एएएसयू के तब उपाध्यक्ष और वर्तमान भाजपा नेता जगदीश भुइयां ने अकेले इस मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट में न्याय की लड़ाई लड़ी। जिसके बाद इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए गए थे। वर्तमान में असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल उस वक्त एएएसयू के अध्यक्ष थे।

डिब्रुगढ़ जिले के डिनजन स्थित 2 इंफेंट्री माउंटेन डिवीजन में हुए कोर्टमार्शल में यह फैसला लिया गया है। हालांकि अभी इस फैसले को कोलकता स्थित पूर्वी आर्मी कमांड और दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय में उच्च आधिकारियों के समक्ष पेश किया जाएगा जहां से इस पर मुहर लगेगी। इस प्रक्रिया में दो से तीन महीने का समय लग सकता है। सभी दोषी इसके खिलाफ सैन्य अधिकरण और सुप्रीम कोर्ट में जा सकते हैं।

सैन्य अदालत ने दंगारी सेना मुठभेड़ में 18 पंजाब रेजिमेंट के मेजर जनरल एके लाल, कर्नल थॉमस मैथ्यू, कर्नल आरएस सिबिरन, कैप्टन दिलीप सिंह, कैप्टन जगदेव सिंह, नायक अल्बिंदर सिंह और नायक शिवेंद्र सिंह को दोषी करार दिया है।

मेजर जनरल एके लाल पर एक महिला ने योगा सिखाने के बहाने गलत आचरण का आरोप लगाया था। जिसके बाद लाल को सितंबर 2007 में लेह की तीसरी इंफेंट्री डिविजन से हटाया गया था। 2010 में कोर्टमार्शल के बाद उन्हें से सेवा से अलग किया गया था। हालांकि सैन्य आधिकरण ने बाद में उनके सेवानिवृत्ति के लाभों को बहाल रखा था।

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