कांग्रेस ने बीजेपी का और अतीक अहमद ने बिगाड़ा सपा का खेल

नई दिल्ली। वर्ष 2004 में फूलपुर से सांसद रहे बाहुबली अतीक अहमद ने फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ने का एलान कर समाजवादी पार्टी का खेल बिगाड़ दिया है। वहीँ कांग्रेस ने इस सीट पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतार कर बीजेपी का गणित हिला कर रख दिया है।

बीजेपी ने फूलपुर सीट पर कौशलेन्द्र सिंह पटेल को, वहीँ कांग्रेस ने इस सीट पर मनीष मिश्रा को तथा समाजवादी पार्टी ने नागेंद्र पटेल को उम्मीदवार बनाया है। अब अतीक अहमद के निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ने के कारण इस सीट पर समीकरण पूरी तरह बदल गया है।

जहाँ कांग्रेस का उम्मीदवार ब्राह्मण समुदाय से होने के कारण बीजेपी के ब्राह्मण मतदाताओं में सेंधमारी का खतरा पैदा हो गया है वहीँ समाजवादी पार्टी द्वारा पटेल समुदाय से उम्मीदवार खड़ा किये जाने से पटेल मतदाताओं के मतों का विभाजन भी तय माना जा रहा है। ऐसे में मुस्लिम मतदाताओं से आस लगाए बैठी समाजवादी पार्टी को अतीक अहमद के मैदान में आने से बड़ा झटका लगा है।

जातिगत आंकड़ों को देखें तो इस संसदीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा पटेल मतदाता हैं, जिनकी संख्या करीब सवा दो लाख है। सपा और बीजेपी दोनो पार्टियों के उम्मीदवार पटेल समुदाय से होने के कारण पटेल मतों का विभाजन तय है।

वहीँ इस सीट पर मुस्लिम, यादव और कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी इसी के आसपास है। लगभग डेढ़ लाख ब्राह्मण और एक लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता हैं। फूलपुर की सोरांव, फाफामऊ, फूलपुर और शहर पश्चिमी विधानसभा सीट ओबीसी बाहुल्य हैं. इनमें कुर्मी, कुशवाहा और यादव वोटर सबसे अधिक हैं।

इस सीट पर 2014 में मोदी लहर के कारण बीजेपी को ब्राह्मण, पटेल, अनुसूचित जाति और ओबीसी मतदाताओं का भरपूर वोट मिला था। लेकिन इस बार स्थति बहुत बदली हुई है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के बाद अभी तक कोई ऐसा बड़ा काम नहीं हुआ जिसके नाम पर पार्टी मतदाताओं से वोट मांग सके।

वहीँ केंद्र की मोदी सरकार में महंगाई और बेरोज़गारी को लेकर जनता के बीच सरकार के प्रति उदासीनता है। ऐसे में 2014 की तुलना में सपा और कांग्रेस का पलड़ा अधिक भारी माना जा रहा ही।

अभी बहुजन समाज पार्टी द्वारा उपचुनाव न लड़ने की दशा में कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन का एलान किया जा सकता है। हालाँकि अभी ये खबरें अपुष्ट सूत्रों से आ रही हैं। फ़िलहाल सभी की निगाहें बहुजन समाज पार्टी पर लगी हुई हैं।

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